Monday, March 15, 2010

रमेश भाई ओझा की कथा


आप में से कई लोगों ने रमेश भाई ओझा का नाम सुना होगा। कई लोगों ने उनकी कथा भी सुनी होगी। मैं धार्मिक व्यक्ति नहीं हूं लेकिन टीवी पर जब कभी उनका प्रवचन चलता है, मैं कुछ देर रुक कर सुन लेता हूं।
उनका अध्ययन विशाल है। उनकी दृष्टि व्यापक। उनकी वाणी में तेज है। उनका सेंस ऑफ ह्यूमर बहुत अच्छा है। वे गाते भी बहुत अच्छा हैं। कथा कहने की उनकी शैली बांधने वाली है। गुजरात में उनकी बड़ी मान्यता है। वे देश-विदेश में प्रवचन करते रहते हैं।
कुछ बरस पहले वे हमारे शहर में आए थे। तब मैं एक बड़े अखबार में काम करता था। अखबारों का भी यह दिलचस्प वर्गीकरण है। अखबार अच्छा या बुरा नहीं होता। सही या गलत नहीं होता। वह छोटा या बड़ा होता है।
बहरहाल, मैं पत्नी के साथ उनका प्रवचन सुनने गया। साथ में भंडारा भी था। मुझे भंडारों में खाने का बहुत शौक है। मैं नहीं जानता कि मेरे जाने के पीछे भंडारे की कितनी भूमिका थी, पत्नी को खुश रखने की मंशा कितनी थी और रमेश भाई ओझा को सुनने की उत्सुकता कितनी थी।
मगर मैं अखबारनवीस दादा का पोता हूं और साहित्यकार पिता का पुत्र। सो मैंने बड़ी तन्मयता से रमेश भाई को सुना और समाचार बनाने के लिए जरूरी बातें नोट भी कीं। मेरी एक आदत है। कोई बात पसंद आ जाती है तो उसके बारे में दस लोगों को बता डालता हूं। सो मैंने खबर बनाने के साथ साथ प्रेस में कई लोगों को कथा के अंश सुना दिए। कई लोगों को रमेश भाई ओझा का परिचय दे डाला। कई लोगों को वहां जाने की प्रेरणा दे डाली।
मेरे कुछ परिचित वहां गए भी। और लौटकर मुझे धन्यवाद दिया कि मैंने उन्हें एक अच्छी अच्छी जगह जाने का अवसर दिया। ज्यादातर ने लौटकर बताया कि रमेश भाई बहुत विद्वान व्यक्ति हैं, उनकी भाषा बहुत सुगम और प्रभावशाली है। कुछ ने कथा के बारे में भी चर्चा की।
इन्हीं में एक सज्जन सबसे अलग थे। उनसे मेरी बनती नहीं थी। वे पैसे वाले थे और गरीबों के प्रति अपनी हिकारत को छिपाते नहीं थे। प्रेस के प्रभावशाली लोगों के पास जाकर वे उठते बैठते रहते थे। पता नहीं वे उन्हें क्या दे देते थे कि उनका देर से आना सब नजरअंदाज करते थे। वे नौकरी छोड़कर चले जाते थे और कुछ दिनों बाद फिर लौट आते थे। मैंने सुना था कि वे शिकायतें करने में माहिर हैं। इसलिए कई सीनियर भी उनसे डरते हैं।
जहां तक मेरा खयाल है, मैंने उन्हें कथा के बारे में नहीं बताया होगा। उन्होंने तब सुन लिया होगा जब मैं दूसरों को बता रहा होऊंगा। वैसे भी रमेश भाई ओझा का शहर में आना एक बड़ा समाचार था। जो भी हो, मतलब की बात यह है कि वे भी कथा सुनने गए।
लौटकर उन्होंने बताया- मैं भी गया था कथा सुनने। बहुत अच्छी व्यवस्था है। अरे भई, आयोजकों की इनर सर्किल के एक भाई मेरे परिचित निकल गए। फिर क्या था- उन्होंने बहुत आग्रह पूर्वक मुझे आगे ले जाकर बिठाया। वहां गद्दे लगे हुए थे। पंखे चल रहे थे। रमेश भाई को हम लोग बहुत पास से देख सकते थे। बाहर गर्मी बहुत थी लेकिन हम लोग आराम से बैठे। कथा के बाद मेरे परिचित ने मुझसे भंडारे में प्रसाद लेने का आग्रह किया। एक तो भीड़ बहुत थी। फिर हमें वापस भी आना था। सो हम हाथ जोड़कर लौट आए।
उन्होंने कई लोगों को यह कथा सुना डाली। अपने परिचित से अपने प्रगाढ़ रिश्तों को बार बार बता डाला। आयोजकों का महिमामंडन किया और आयोजन का अनुमानित खर्च भी बता दिया। उन्होंने यह भी बता दिया कि आयोजन स्थल का किराया कितना है और उसका एरिया कितना है।
जो लोग उन्हें जानते थे उन्होंने उनसे नहीं पूछा कि कथा में रमेश भाई ओझा ने क्या कहा।

( एक पुराना संस्मरण)

2 comments:

Unknown said...
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