Sunday, December 20, 2009

किनारे बैठने से क्या होगा?

छत्तीसगढ़ में नगरीय निकायों के चुनाव हो रहे हैं। यह लोकतंत्र का सबसे बड़ा त्योहार है। जनता अपनी जरूरतों का ध्यान रखने के लिए अपने प्रतिनिधि चुनती है। उन्हें जनता के लिए काम करना होता है। यह अलग बात है कि चुने जाने के बाद बहुत से लोग जनता के काम पर कम, अपने काम पर ज्यादा ध्यान देने लगते हैं। गरीब नेता पद पाकर अमीर होने लगते हैं। कुछ तो सात पीढिय़ों के लायक धन इकट्ठा कर लेते हैं। इसीलिए राजनीति और नेताओं को लेकर लोगों के मन में अच्छी धारणा नहीं है। लेकिन यह सब जनता में लोकतंत्र की समझ और संस्कार के अभाव का नतीजा है। जनता का एक बड़ा वर्ग अपनी जिम्मेदारियां निभाने के लिए तैयार नहीं है। या उसके पास इसके लिए वक्त नहीं है। ताकत नहीं है। जनता की यह कमजोरी, यह मजबूरी जितनी जल्दी दूर होगी, लोकतंत्र उतनी ही जल्दी बेहतर नतीजे देगा। लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन है। जनता को अपने शासन की जिम्मेदारी समझनी होगी। उसे राजा-प्रजा के जमाने के संस्कारों से खुद को बाहर निकालना होगा और जो लोग खुद को राजा समझते हैं उन्हें यह अहसास दिलाते चलना होगा कि भाई साहब-बहनजी आप लोग हमारे बीच के ही हो। अभी हो यह रहा है कि देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू है पर शासक और शासित के दो वर्ग बने हुए हैं। एक तरफ नेता-मंत्री, अफसर, बड़े धनपति, बाहुबली किस्म के लोग हैं दूसरी तरफ आम लोग। शासक वर्ग जनता से दूर रहता है और क्रमश: दूर होता चला जाता है। दूर का मतलब यह कि गरीब जनता गरीब रह जाती है और शासक वर्ग के लोगों का धन बढ़ता जाता है। आमतौर पर जो शासक वर्ग है वह नहीं चाहता कि जनता जागरूक और जिम्मेदार बने। वह नहीं चाहता कि उसका काम काज सूचना के अधिकार के जरिए पारदर्शी हो जाए। वह शासक बने रहना चाहता है। दरअसल कमजोर जनता ने इन्हें शासक बना रखा है। ये शासक नहीं हैं। इन्हें प्रबंधक कहा जाना चाहिए। शासन तो जनता का है। जनता को यह बात महसूस करनी होगी। और खुद पर जिम्मेदारी लेनी होगी। इसके लिए जनता को पहले खुद को शिक्षित बनाना होगा। संघर्ष की क्षमता अपने में विकसित करनी होगी। बहुत से लोग यह काम कर रहे हैं। वे शासक वर्ग को यह अहसास दिलाने में लगे हैं कि भाई साहब आप हमसे अलग नहीं हो। ऐसे ही प्रयासों के चलते भ्रष्ट नेता जेल जाते हैं और प्रभावशाली पदों पर काम करने वालों का काम, उनकी संपत्ति सूचना के अधिकार के दायरे में आती है। संघर्ष करने वालों के कारण ही जनता को बहुत से अधिकार मिलते चले जाते हैं। लेकिन यह काम कुछ लोगों के भरोसे छोडऩा ठीक नहीं। हर नागरिक को जिम्मेदार और सक्षम बनना होगा। तभी असमानता और अन्याय दूर होगा। राजनीति के नाम पर नाक भांै सिकोडऩे वालों कों राजनीति में खुद भी आना चाहिए। देखना चाहिए कि बुरे माने जाने वाले लोग क्यों सफल हैं। देखना चाहिए कि वे खुद कैसे सफल हो सकते हैं। ताकत तो ताकत होती है। वह चाहे भले आदमी के पास हो चाहे बुरे आदमी के पास, उसके दम पर काम किए जा सकते हैं। तो जनता को ताकत जुटानी होगी। हमें आंखें खोलकर सफल नेताओं के दुर्गुणों के बीच, उनके गुणों को देखना चाहिए। बहुतेरे नेता हैं जो सुबह जल्दी उठते हैं, कसरत करते हैं, संयमित भोजन करते हैं, अध्ययन करते हैं, दिन भर और शायद देर रात तक काम करते हैं, वे अपने परिवार को समय कम दे पाते हैं, अपने निजी शौक के लिए उनके पास समय नहीं रहता, जीवन जनता के काम के लिए समर्पित हो जाता है। बहुत से नेताओं को राजनीति के उतार चढ़ाव देखने पड़ते हैं, खतरे उठाने पड़ते हैं। नेताओं की बुराई करने से पहले यह देखना चाहिए कि हममें क्या उनके जैसी अच्छी आदतें हैं? हम उनके जितना त्याग कर रहे हैं? खुद को ताकतवर बनाने के लिए क्या उतना समय, उतना श्रम लगा रहे हैं? हममें से ज्यादातर लोग राजनीति के समुद्र के किनारे बैठकर लहरें गिनते हैं। उन्हें समुद्र में उतरना चाहिए। साहसिक यात्राओं पर निकलना चाहिए। गोते लगाकर मोती ढूंढने चाहिए। और दूसरों के लिए मिसाल बनना चाहिए कि भइया मोती इस तरह मिलते हैं। तूफानों का सामना इस तरह किया जाता है। इस तरह जिया जाता है। किसी शायर ने कहा है-

मोहब्बत को समझना है
तो खुद नासेह मोहब्बत कर
किनारे से कभी
अंदाजा ए तूफां नहीं होता

Thursday, December 17, 2009

मेरी बेटी, मेरा फख्र

(एक पत्रिका के लिए अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी सबा अंजुम की मां फरीदा बेगम से एक मुलाकात मौका लगा था। उनकी कहानी, उन्हीं की जुबानी)
चौथी पढ़ती थी सबा। हमेशा बोलती थी- मैं भी हॉकी खेलने जाऊंगी। तनवीर सर के पास नाम लिखाऊंगी। मोहल्ले के सारे बच्चे खेलने कूदने वाले थे। उनमें से कुछ हॉकी खेलने मैदान भी जाते थे। सबा के भाई भी जाते थे। वह उनके साथ मैदान चली जाती थी। उछल कूद करती रहती थी। लड़कियों के साथ नहीं खेलती थी। लड़कों के साथ खेलती थी। कंचे खेलना उसका शौक था। पतंग भी वह उड़ाती थी और कटी हुई पतंगें लूटती भी थी। हमारे घर में बच्चों को स्कूल न जाने के लिए कभी डांट नहीं पड़ी। खेलने न जाओ तो जरूर डांट पड़ती थी। ऐसे में सबा एक रोज स्कूल से देर से आई। मैंने पूछा तो उसने बताया- तनवीर सर के पास नाम लिखवाने गई थी। तनवीर सर हमारे घर के पास ही रहते हैं। वे बच्चों को सिखाते थे। सबा ने उनकी देखरेख में हॉकी खेलना शुरू किया। मैं तो समझती नहीं खेल के बारे में। सबा बताती है कि खेल में वह आज जो कुछ है, तनवीर सर की बदौलत है। तनवीर सर भी उसे बेटी जैसा प्यार करते हैं। एक कोच के लिए सारे खिलाड़ी बराबर होते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि उन्होंने मेरी बेटी पर ज्यादा ध्यान दिया। शायद उन्हें लगा हो कि यह लड़की आगे तक जा सकती है। हमारे लिए वे दिन बहुत गरीबी के थे। बच्चों के अब्बा मस्जिद में मुअज्जन थे। आठ सौ रुपया महीना पगार मिलती थी। घर के खर्चे चलाने के लिए मैं छोटे छोटे काम करती थी। नगर निगम में किसी का काम है तो मैं कुछ पैसे लेकर वह काम करवा आती थी। किसी के लिए कथरी सी देती थी। घर में पिपरमेंट-बिस्कुट की दुकान इनके अब्बा ने खोली थी। मैंने खुद बारह साल अंडे बेचे हैं। मगर इस मुफलिसी का अहसास हमने कभी अपने बच्चों को होने नहीं दिया। मैं उनसे कहती थी- तुम्हें क्या चाहिए बोलो। इसकी फिक्र मत करो कि अम्मी कहां से लाएगी। मेरे बच्चों को मुझ पर भरोसा भी बहुत था। इसी दौरान सबा को विदेश जाने का पहला मौका लगा। उसे हांगकांग जाना था। पासपोर्ट के लिए दो हजार रुपयों की जरूरत थी। वह बंैगलोर में थी। उसने मुझे खबर भेजी। और अपनी सहेलियों को बता दिया- मेरी अम्मी रुपयों का इंतजाम कर लेगी। मैंने घर के लिए राशन खरीद कर रखा था। उसे मोहल्ले में बेच दिया। अंडे बेच कर 4 हजार के बर्तन खरीदे थे, वे मैंने 17 सौ में बेच दिए। बड़ी बेटी को विदा करते वक्त इतना नहीं रोई होऊंगी जितना ये बर्तन बेचकर रोई। मोहल्ले वाले समझाते थे- सबा जीत कर लौटेगी, फिर बर्तनों की दुकान खोल लेना। बहरहाल, रुपयों का इंतजाम मैंने कर लिया। सबा को ये रुपए पहुंचाने उसका भाई भोपाल से आया और बैंगलोर तक गया। सबा की कोच को पता चला तो उसने मुझसे फोन पर कहा- आप बहुत अच्छी मम्मी हैं। सबा बहुत भरोसे से कहती थी कि मेरी मम्मी रुपयों का इंतजाम कर देंगी। गरीबी के उन दिनों में हम लोग उस खुराक का इंतजाम नहीं कर पाते थे जो एक खिलाड़ी के लिए जरूरी होती है। खेलकर आने के बाद सबा को खूब भूख लगती थी। मैं उसके लिए काली चाय बना देती थी। दूध तो नसीब नहीं था। कभी कभी शक्कर भी नहीं होती थी। सबा काली चाय के साथ रात का चावल खा लेती थी। यह खाना उसे आज भी पसंद है। आज भी कभी कभी मूड होने पर वह चाय चावल की फरमाइश करती है। सबा को लल्ला होटल की पोहा-जलेबी भी पसंद थी। यह होटल कसारीडीह में है। हमारे उन लोगों से घर जैसे संबंध हैं। घर की बुजुर्ग महिला को सबा नानी कहती थी। मुझसे दो रुपए लेती थी और होटल से एक रुपए का पोहा और एक रुपए की जलेबी ले आती थी। वही उसका नाश्ता होता था। विदेश घूमने के बाद भी वह लल्ला होटल को नहीं भूली। इंग्लैंड से खेलकर लौटी तो एक रोज उसे पोहा जलेबी की याद आई। वह सीधे होटल पहुंच गई। तब तक वह मशहूर हो चुकी थी। उसे देखने के लिए पूरा कसारीडीह इकट्ठा हो गया। नानी की आंखों से आंसू बहने लगे। उसने कहा- तुम बहुत बड़ी हो गई हो। मैंने सोचा था अब कभी हमारे होटल में नहीं आओगी।मेरी दिली तमन्ना थी कि सबा खेलने के लिए विदेश जाए। सबा ने पहली बार विदेश जाने से पहले मुझे फोन किया और कहा- अल्लाह का कितनी बार शुक्रिया अदा करूं कि उसने मेरी अम्मी की दुआ सुन ली। आज भी वह खेलने जाने से पहले मुझे फोन करती है। कहती है- तुमसे बात किए बगैर खेलने में मन नहीं लगता। खेलने के बाद भी बात करती है। कभी कभी थिएटर से फोन करती है कि फिल्म बोर है। अगर उसे पता लगा कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है तो दिन में दस बार फोन करती है। पूछती है दवा खाई कि नहीं। वह अब मुझे कहीं आने जाने नहीं देती। कहती है- बहुत हो गई भागदौड़। अब आराम करो। वह जहां जाती है, मेरे लिए कुछ न कुछ खरीद लाती है। साडिय़ां, पर्स, परफ्यूम। मंै कहती हूं- अब मेरे पहनने ओढऩे के दिन नहीं रहे। वह कहती है- जब दिन थे तब गरीबी थी। अब अल्लाह ने दिया है तो पहनना ओढऩा चाहिए। मैं कहती हूं- लोग क्या कहेंगे? वह कहती है- लोगों की परवाह मत करो। मेरे बच्चों ने दुनिया घूम ली और मैं डोंगरगढ़ के आगे नहीं जा पाई। मेरी नागपुर घूमने की बड़ी तमन्ना है। पोली कहती है कि नागपुर क्या, तुम्हें पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, बाम्बे सब घुमाऊंगी। एक बार अपने साथ कोरबा ले गई थी। लॉज में रुकवाया जहां बड़े लोग रुकते हैं। मैंने पहली बार जाना कि लॉज किसे कहते हैं। मेरे पास एक सायकल है। मैंने उसे मुफलिसी के दिनों में चलाया है। वह मुझे बेहद पसंद है। दस कारें भी उसका मुकाबला नहीं कर सकतीं। पोली कहती है कि उसे म्यूजियम में रखवा देंगे। अब घर में एक नई दोपहिया है। एक रोज पोली का फोन आया- अम्मी, गाड़ी भूलकर भी मत चलाना। उसने कहीं कोई एक्सीडेंट देख लिया था। मुझसे बोली- कहीं तुम निबट गए तो मैं अनाथ हो जाऊंगी। वह मुझसे दोस्तों जैसी बात करती है। एक रोज उसने घर में गोभी का पुलाव बनाया। मुझसे पूछा- कैसा बना है। मैंने कहा- अपने हिसाब से अच्छा बना लिया तुमने। उसने कहा- सच सच बताओ, कैसा बना है? क्या कम है? मैंने कहा- नमक कम है और मिर्च कम है। उसने पूछा- और क्या कमी है? मैंने कहा- जले हुए जैसी गंध आ रही है। वह बोली- मैंने इतनी मेहनत से बनाया तुम तारीफ भी नहीं कर सकतीं? मैंने कहा- वही तो कर रही थी, तुमने सच पूछा तो बताना पड़ा। बाद में उसने एक रोज बांबे से फोन किया था- मैंने पुलाव बनाना सीख लिया है। अब जलाती नहीं हूं। उसे चावल का चीला बहुत पसंद है। आलू का पराठा भी। मिर्च मसाले वाली चीजों की भी फरमाइश करती है जो शायद उसे खेल के दौरान नहीं मिलतीं। हम लोग पचीस साल एक ही मकान में रहे। अब हमने एक बड़ा घर खरीद लिया है। सबा की जिद थी। हमारे परिचित का मकान था। उन्होंने पूछा तो सबा ने बताया- यह मकान मेरे अब्बा की तमन्ना और अम्मी की पसंद है। इन्होंने जीवन भर मुझे मेरी पसंद की चीजें दीं। अब मैं इनकी पसंद की चीज देना चाहती हूं। वह हमें इतना चाहती है। अल्लाह ऐसी औलाद हर मां बाप को दे।

निर्मल वर्मा को पढ़ते हुए

निर्मल वर्मा का उपन्यास एक चिथड़ा सुख बहुत पहले पढ़ा था। एक बिलकुल नई दुनिया को इसके जरिए देखने का मौका लगा। एक कस्बाई मध्यमवर्गीय व्यक्ति के लिए यह दुनिया अपने से बेहतर सोचने समझने वालों और अपने से अधिक स्पष्टï चरित्र वाले लोगों की थी। कलाकारों के जीवन के बारे में पहले बहुत किस्से कहानियां सुन चुका था लेकिन इस उपन्यास के पात्र मिलकर एक अलग ही दुनिया रचते हैं। ऐसे लोगों के दुनिया में होने की कल्पना ही मुझे अपने आप में बहुत अच्छी लगी और अनोखी बात यह लगी कि ये लोग हू ब हू किताब के भीतर भी मौजूद थे। यह ईश्वर और साहित्यकार के रचना संसार का साथ साथ अहसास करते चलना था। मुझे इस उपन्यास के पात्र बिट्टी और उसका कजिन बहुत पसंद आए। अक्सर मुन्नू मुझे अपने जैसा लगता रहा। इस उपन्यास को पढऩा उसकी बगल में दुबके हुए इस अनोखी दुनिया को देखने जैसा था। मैं बिट्टी जैसे कई लोगों को जानता हूं इसलिए उसने चित्रण ने भी मुझे बहुत प्रभावित किया। मेेरे लिए बिट्टïी अपने आप में एक बहुत महान पात्र है और मैं अक्सर सोचता हूं कि इन पात्रों की तकदीर से खेलने वाला लेखक कैसा होगा? इस उपन्यास के जरिए मैंने बिट्टी और मुन्नू के घर को अंदर से देखा। मुझे बहुत अच्छा लगा यह जानकर कि हमारे जैसे दूसरे लोग दिल्ली में भी हैं जो फर्श पर सो लेते हैं। कपड़े खुद धोते हैं। रात बिरात घर आते हैं। देर तक सोते हैं। दूसरे को जगाने के लिए कह देते हैं। जगाने से जागते नहीं और जिन्हें उठाने के लिए उनके कहे का वास्ता देना पड़ता है। जो लोग एक साथ खा नहीं पाते और पर्चियां छोड़ जाते हैं कि खाना बना दिया है, खा लेना। हमारे घर में यही काम बगैर पर्चियों के होता था। बिट्टी और उसके दोस्तों की दुनिया में मैंने पहली बार शराब पीने वालों को इतने करीब से देखा। उनके बीच बैठकर नहीं लगता कि ये लोग कोई अपराध कर रहे हैं। ध्यान इस पर बना रहता है कि ये लोग क्या सोच रहे हैं। ऐसे पात्र हर कहानी के नहीं हो सकते।

सुब्रत बसु को याद करते हुए

रायपुर के पुराने रंगकर्मी सुब्रत बोस से एक बार मिलना हुआ था। वे मर्डर जैसी चर्चित फिल्मों के निर्देशक अनुराग बसु के पिता हैं। उनका पूरा परिवार एक्टिंग से लेकर फिल्म बनाने तक के कामों में जुटा हुआ है। अनुराग आज मुंबई के सबसे व्यस्त निर्देशकों में से हैं। बड़े बड़े फिल्मकार उनसे अपनी फिल्में बनवाना चाहते हैं। सुब्रत से चर्चा के दौरान मुझे अपनी बरसों पुरानी एक धारणा के बारे में नए सिरे से सोचने की जरूरत महसूस हुई। हमने उनसे सवाल किया था कि छत्तीसगढ़ी लोककला बहुत ज्यादा सामने नहीं आ पाई है। इसकी क्या वजह है और इसे सामने लाने के लिए क्या किया जाना चाहिए? हमने यह भी पूछा था कि क्या नाचा को अधिक महत्व देकर ऐसा किया जा सकता है? जवाब में सुब्रत ने कहा कि जो लोग छत्तीसगढ़ की संस्कृति को सामने ला सकते थे उन्होंने सबसे बड़ा नुकसान किया। उन्होंने छत्तीसगढ़ी संस्कृति के नाम पर अपने को प्रोजेक्ट किया। यहां के कवियों ने, संगीतकारों ने यही किया। सुब्रत किसी से दुश्मनी नहीं मोल लेना चाहते थे लेकिन फिर उन्होंने दिल की बात कह ही डाली कि दाऊ रामचंद्र देशमुख के चंदैनी गोंदा समेत, छत्तीसगढ़ी के सांस्कृतिक मंचों में जो गीत संगीत पेश किया जाता था, उस पर गीत-संगीतकारों के अपने अपने दावे होते थे कि ये मोर गीत हे, ये मोर संगीत हे। इसे आप कैसे लोकसंगीत कहेंगे? असली लोकसंगीत को तो उसके पवित्र रूप में कभी आगे ही नहीं आने दिया गया। दाऊ रामचंद्र देशमुख के घर मैं बचपन में एक-दो बार गया हूं। वे वैद्य भी थे और पिताजी को उनसे कंधे की तकलीफ की दवा लेनी थी। उनके घर पर नाच-गाना होते भी मैंने देखा। उनका चंदैनी गोंदा मैंने अपनी आंखों से कभी नहीं देखा, सिर्फ उसकी रिकार्डिंग सुनी। और उसके बारे में उससे जुड़े लोगों ं के संस्मरण मैं लगातार सुनता रहा। और इनके आधार पर मेरी देशमुखजी के बारे में जो धारणा बनी उसमें सम्मान ही सम्मान था। और वह अपनी तरह का एक गरिमामय, अधिक प्रामाणिक छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक मंच था यह धारणा मेरी अभी भी है। लेकिन मोर गीत, मोर संगीत वाली बात मुझे जमी है। तब शायद लोक गीत-संगीत का तत्व भी इतना रहा होगा, इससे जुड़े लोग इतने गंभीर रहे होंगे कि तोर-मोर वाली बात को उतना महत्व नहीं मिला होगा। आज यह बात अधिक स्पष्टï होकर दिखती है। और इस तोर मोर में मुंबई से आयातित मसाला मिला कर तल-भूनकर बाजार में पेश किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक परिदृश्य के इस हिस्से को देखें तो वह शराबखाने के बाहर लगी अंडा दूकान जैसा लगता है।

दिल की बात

मेरा एक दो रोज पहले रायपुर के सप्रे स्कूल मैदान पर जाना हुआ। खेल के मैदान पर समय गुजार कर मैं दफ्तर के काम की थकान उतार लेना चाहता था। मेरी किसी से जान पहचान नहीं थी। सो देखने के अलावा कोई चारा नहीं था। स्कूली लड़कों के, लड़कियों के दल अलग अलग फुटबॉल का अभ्यास कर रहे थे। मैं किसी जमाने में फुटबॉल का शौकीन रहा हूं। और मोहल्ले में खेलता रहा हूं। मुझे देखकर दुख हुआ कि मिडिल स्कूल की पांच छह बच्चियां बगैर किसी मार्गदर्शन के फुटबॉल का अभ्यास कर रही थीं। मैं एक दिन के अनुभव के आधार पर कुछ नहीं कहना चाहता। बच्चियों को खेल की कुछ तकनीकी जानकारियों से वाकिफ देखकर लगा कि इन्हें सिखाया तो जरूर गया है। लेकिन बगैर कोच या किसी जानकार की मौजूदगी के, उनके अभ्यास को देखकर मुझे लगा कि उनकी ताकत व्यर्थ अधिक हो रही है। वे सीख कम रही हैं। मैं नहीं जानता कि इन लड़कियों को सिखाने के लिए कोई कोच होता तो वह भी वे बारीकियां इन बच्चियों को सिखाता कि नहीं जिनके बारे में मैं सोच रहा था। मैंने बहुत मौकों पर शहर में बच्चों को, और बड़ों को भी फुटबॉल खेलते देखा है। मैच खेलते भी देखा है और अभ्यास करते भी देखा है। मुझे फुटबॉल का असली आनंद कभी नहीं आया। मुझे लगता है कि ज्यादातर लोग फुटबॉल के आनंद को जानते ही नहीं। और फुटबॉल खेलने के बारे में उनके पास कोई मौलिक विचार नहीं है। फुटबॉल खेलते बच्चों में मुझे सबसे बड़ी कमजोरी नजर आई, जो बड़ों में भी उतनी ही नजर आई, कि फुटबॉल उनके लिए खेल न होकर युद्ध हो जाता है या फिर भगदड़। किसी को देखकर यह नहीं लगता कि उसे फुटबॉल खेलने में मजा आ रहा हो और वह फुटबॉल पर इतना अधिकार रखता हो कि दूसरों को नचा कर खुद का भी और दर्शकों का भी मनोरंजन कर सके। फुटबॉल के साथ जो आनंद न मना सके, वह फुटबॉल क्या खेलेगा? फुटबॉल खेलने वालों में मुझे दूसरी सबसे बड़ी कमजोरी यह नजर आई कि कोई अपनी लय से खेलता नजर नहीं आता। कोई टीम एक लय से खेलते नजर नहीं आती। और कुल मिलाकर खेल की कोई लय नहीं बन पाती। खिलाड़ी बदहवास होकर गेंद के पीछे भागते हैं और गेंद कभी उनके नियंत्रण में नहीं रहती। वे लड़ते ऐसे हैं जैसे पशु लड़ते हैं और गेंद अक्सर साइड लाइन या गोल लाइन के बाहर जाती रहती है। पास, ड्रिबल, डॉज और मूव के साथ खेलते मुझे शायद ही कोई टीम दिखी। हालांकि मैं दावा नहीं करता कि रायपुर में खेलने वाली सारी टीमों का खेल मैंने देख लिया है। लेकिन बीस पचीस टीमों का खेल तो देखा ही होगा। मुझे लगता है कि अपनी क्षमता के हिसाब से अपने को विकसित करना कोई कोच किसी खिलाड़ी को नहीं सिखाता। जैसे कम बुद्धि महिलाएं पड़ोसन को देखकर अपना जीवन तय करती हैं वैसे ही ज्यादातर फुटबॉलर विपक्षी के हिसाब से अपना खेल तय करते हैं। जब विपक्षी से मुकाबला है तब तो विपक्षी के हिसाब से कुछ चीजें तय करनी ही होंगी लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि आपके पास कोई लय, कोई तालमेल, कोई रणनीति ही न रहे। भई विपक्षी को आपके हिसाब से रणनीति तय करने दें.सप्रे स्कूल मैदान पर बालिकाओं को मैंने खेलते देखा। वे दूर से किक मार रही थीं और उनकी किक में कोई दम नहीं था। मैं होता तो सिखाता कि पहले अपनी क्षमता के हिसाब से, कम दूरी से किक मारो और लक्ष्य पर मारने की कोशिश करो। इसका अभ्यास करते करते ताकत भी आती जाएगी और निशाना भी सही बनेगा। दूर से किक मार रही लड़कियों का जी उचट रहा था, गेंद इधर उधर जा रही थी, उसे लाने में ही लड़कियों की बहुत सी ताकत खत्म हुई जा रही थी। मुझे नहीं लग रहा था कि इन लड़कियों को किसी ने स्टेमिना, डाइट जैसी चीजों के बारे में बताया है। ये चीजें कोई भी सीनियर खिलाड़ी बता सकता है जो खेल के प्रति गंभीर हो और जिसने ये सब चीजें सीखी हों। मुझे पता नहीं शहर के कितने खिलाड़ी अपने से ज्यादा जानने वालों से जाकर मार्गदर्शन लेते हैं और कितने सिर्फ टूर्नामेंंट में खेलते हैं। पता नहीं कितने खिलाड़ी और कोच, मैदान को साफ सुथरा रखने के बारे में भी सोचते होंगे। मैदान से गिट्टी, पत्थर हटाना, कांच के टुकड़े बीनकर फेंकना, झाडिय़ां साफ करना, पानी छिड़कना-ऐसे बहुत से काम हैं जो खिलाडिय़ों और प्रशिक्षकों को करना चाहिए। अगर खिलाडिय़ों से उम्मीद नहीं की जाएगी कि वे मैदान से प्यार करें, तो फिर किससे उम्मीद की जाएगी?

राज्योत्सव की यादें

एक और राज्योत्सव बीत गया। और अपने पीछे बहुत सी यादें, बहुत से सवाल छोड़ गया। यादें तो होंगी ही। इतने दिनों तक, इतने लोग कहां बार बार जुटते हैं? इतने सारे स्टाल कहां लगते हैं? पूरी सरकार सामने रहती है। पूरा बाजार सामने रहता है। चना जोर गरम से लेकर भिलाई इस्पात संयंत्र, टाटा, जिंदल सब वहां होते हैं। लेकिन इतना सब कुछ होने पर भी यह मेला बहुत से मामलों में खटकता रहा। अगर इन पर ध्यान दिया जाएगा तो आगे इसका भविष्य अच्छा होगा। वरना इतना सारा इंतजाम हो तो भीड़ तो कहीं भी जुट जाती है। राज्योत्सव के सरकारी आयोजनों को सरकारी आयोजन के घिसे पिटे अर्थ से बाहर आना चाहिए। सरकारी आयोजन का मतलब होता है चूंकि ऊपर से आदेश आया है इसलिए कुछ झांकी बनाकर पेश करनी है। राज्योत्सव के इतने बरस में देखा जा चुका है कि बहुत से वही वही चेहरे नजर आते हैं। और कुछ व्यक्तियों को आयोजन से बड़ा महत्व मिला होता है। सरकारी लोग आम लोगों से दूरी बनाकर रखते हैं। वे अलग दरवाजों से अंदर जाते हैं, अलग जगह गाड़ी खड़ी करते हैं, स्टाल पर सोफे लगाकर बैठते हैं। थके हारे बच्चे बूढ़े भले दो मिनट सुस्ताने के लिए जगह ढूंढते रहें। सोफे पर बैठ गए तो सवाल खड़ा हो जाता है- आप कौन हैं, क्या काम है आपको? ेमेले में खर्च अधिक होता है, उपयोगिता कम होती है। मेले में ज्यादातर स्टाल विभाग के कामकाज के बारे में अच्छी तरह जानकारी नहीं दे सके। कुछ में मुर्दा और बेहूदा किस्म के पुतले बनाकर रखे गए थे और लोग उन्हें देखकर हंस रहे थे। टीका टिप्पणियां कर रहे थे। सरकारी विभाग के लोग बेपरवाही में, मजबूरी में स्टाल पर या आसपास खड़े नजर आए। कहीं कहीं तो कोई कुछ बताने वाला नहीं था। बहुत से स्टालों में बहुत से उत्साही लोग थे जो कुछ बताने को उत्सुक थे, निजी क्षेत्र के स्टालों में भी ऐसे लोग थे और सरकारी क्षेत्रों में भी, लेकिन सारे लोग ऐसे नहीं थे। स्टालों पर जितना खर्च दिख रहा था, उनकी उपयोगिता उतनी ही कम थी। इतनी भीड़ थी कि कहीं खड़े रहकर कुछ पूछना मुश्किल हो रहा था। बहुत से स्टालों में नेताओं के फोटो लगे थे मानो उनका मंदिर बना दिया गया हो। और वही घिसा पिटा, कठिन हिंदी में सरकारी प्रचार। प्रदेश की संभावनाओं, उन संभावनाओं को सच करने की दिशा में हो रहे प्रयासों, चुनौतियों और कमियों का मौलिक सोच के साथ, संपूर्णता में प्रदर्शन बहुत कम दिखा। उत्सव के दौरान कुछ राजेनेता और उनके करीबी लोग बार बार मंच पर आते रहे। मंच पर आने के बहाने खोजते रहे। कभी कभी तो लगा कि इनके लिए उत्सव हो रहा है। यह सस्तापन खत्म होना चाहिए। मंच पर जिसका काम हो उसे ही रहना चाहिए। और कलाकारों से लेकर उद्घोषक तक, नए ढंूढने चाहिए। हर बार नए नए लोगों को मौका मिलना चाहिए। प्रदेश में प्रतिभावान, सक्षम लोगों की कमी नहीं है। मगर खुद को और अपने दरबारियों को खुश करने वाले लोगों को इससे क्या मतलब। प्रदेश के संस्कृति कर्मियों को मिलकर इस विषय पर गंभीर सोच विचार करना चाहिए कि राज्योत्सव के मंच पर किन लोगों को स्थान दिया जाना चाहिए, उनका स्तर क्या है, उन्हें पहले कितने अवसर मिल चुके हैं, क्या लोकतंत्र नाम की कोई चीज है कि नहीं या वह कुछ पैसे वालों की जेब में डाल दिया गया है? हालांकि जो लोग सत्ता की मलाई खाने के लिए खुद लाइन में लगे हुए हैं, ऐसे लोगों को हटा दिया जाए तो विचार करने के लिए बहुत कम लोग बचेंगे। राज्याश्रय का मोहताज मीडिया भी इस तरह के मुद्दों को छूता नहीं। वैसे अच्छा ही है। मीडिया पर हावी कुछ पैसे वाले बददिमाग लोग फिर जज बनकर संस्कृति के बारे में फैसले देने लगेंगे। राज्योत्सव में गंदगी देखकर मन खराब होता है। इतने कागज पड़े होते हैं, इतनी जूठन पड़ी होती है, कोई रोकने-टोकने वाला नहीं, कोई उठाकर साफ कर देने वाला नहीं। सब अपने अपने कपड़ों की फिक्र कर रहे हैं। मंत्रियों को तो खैर स्पेशल रास्ते से आना है, कार से उतरना है और मंच पर बैठ जाना है। उन्हें गंदगी से क्या लेना देना। मरे जनता गंदगी में। खाने पीने के स्टाल के बारे में कहना होगा कि छत्तीसगढ़ का राज्योत्सव है तो छत्तीसगढ़ को प्रमोट करने का एक अच्छा मौका है। एक स्टाल छत्तीसगढ़ी व्यंजन का लगाकर यह काम पूरा नहीं होता। चाट पकौड़ी और आइसक्रीम के स्टालों की भरमार के बीच कहीं तो लगना चाहिए कि छत्तीसगढ़ का उत्सव है। छत्तीसगढ़ में हजारों किस्म का धान होता है। यहां के कुछ इलाकों का दुबराज मशहूर रहा है। क्यों नहीं छत्तीसगढ़ की इस समृद्धि को इतनी ही जगह दी जाती जितनी फूहड़ और बेजान सरकारी विभागों को दी गई? जिनमें बिकने वाला सामान इतने घटिया ढंग से पेश किया गया मानो यह छत्तीसगढ़ की मूर्खता को प्रदर्शित करने की नीयत से किया जा रहा हो। बाजार में बिकने वाले चिप्स की पैकिंग की तुलना में घरेलू उद्योगों के प्रोडक्ट को देखकर रोना आ रहा था। ऐसा नहीं कि छत्तीसगढ़ ऐसा है। दरअसल सरकारी तंत्र ऐसा है।

Wednesday, December 16, 2009

दशहरे की एक याद

आज दशहरा है। अक्सर दशहरे पर कुछ लिखने का संयोग बन जाता है। पिछले कई दशहरों पर मैंने महसूस किया कि ठंड इसी दिन से शुरू होती है। लेकिन इस बार पिछले कई दिनों से ठंड महसूस हो रही है। दिन में तो इसका पता नहीं चलता लेकिन देर रात और सुबह सुबह अच्छी ठंडकर रहती है। कल मैंने पांच छह जगह भंडारों का आनंद लिया। मेरे लिए यह एक आनंद है। मैं इसे एक लोकतांत्रिक आयोजन पाता हूं। हालांकि यह आयोजकों पर निर्भर करता है कि वे कितने लोकतांत्रिक हैं। वे भक्तों के लिए भोजन का प्रबंध करने वाले सेवक हैं कि गरीबों को खैरात बांटने वाले सामंत। अलग अलग जगहों पर मैंने अलग अलग तेवर वाले आयोजक देखे। सबसे विनम्र नए बस स्टैंड के भंडारे वाले थे। वे सब गरीब थे और लोगों को बुला बुलाकर माता का प्रसाद बांट रहे थे। यह आलू और गोभी वाला पुलाव था और बहुत स्वादिष्टï था। मैंने पिछले आठ नौ दिनों तक भूख से निबटने के पूरे इंतजाम के साथ उपवास किया था। ऐसे उपवास में बड़ा मजा आता है। जरा भी चर्बी कम नहीं होती। जरा भी कष्टï नहीं होता। भूख का तो मानो अहसास तक नहीं होता। जब भी भूख लगे, आपके पास साबूदाने की खिचड़ी, आलू की टिकिया, केले, सेब, अंगूर, दूध सब हाजिर हैं। बाजार में हल्दीराम का फलाहारी चिवड़ा मिलता है और बनाना चिप्स भी। पाक कला में निपुण, खाने पीने की शौकीन, संपन्न भक्तन महिलाओं के साथ अगर आप उपवास करेंगे तो फायदे में रहेंगे। बहरहाल, इस उपवास में सिर्फ इतना कष्टï था कि अनाज एक टाइम खाना है और लहसुन प्याज नहीं खाना है। मैं सच्चा उपवास करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। मगर एक टाइम खाने का नियम रखकर भी महसूस किया कि उपवास एक अनुशासन सिखाता है, संयम सिखाता है। दुनिया में खाने पीने की ढेर सारी चीजें हैं। लेकिन कब कितना खाना है, यह इंसान को अपने नियंत्रण में रखना चाहिए। चीजें तो इतनी हैं कि वह खाता रहे। लेकिन नुकसान उसे ही उठाना है। यह सिर्फ खाने के मामले में नहीं, हर मामले में होता है।मैंने भंडारों में घूम घूम कर तय किया है कि कभी अनुकूल वातावरण रहा तो अपने मित्रों के साथ मिलकर इसका आयोजन करूंगा। बचपन में हम सब घरों से अनाज और दूसरी चीजें इक_ïा करके पिकनिक करते थे। यह भी इसी तरह की चीज है। मिलबांट कर खाने का सुख इन भंडारों से मिलता है। भंडारे हमें याचक भाव सिखाते हैं। याचक भाव का यह मतलब नहीं कि हम पूरी जिंदगी मांगकर बैठे बैठे खाएं। याचक भाव का मतलब है कि हममें हेकड़ी न रहे। यह हेकड़ी कभी कभी इंसान को सूखी लकड़ी की तरह तोड़ देती है।

अगले बरस तू जल्दी आ

उस रोज मैं बहुत तनाव में था। घर से नाराज होकर निकला था। शरीर कुछ भारी भारी लग रहा था। शहर में ऐसा कोई दोस्त नहीं जिसके पास जाकर बतिया लिया जाए और मन हो तो घूम लिया जाए। फिर भी ऐसा एक दोस्त ढूंढ़ निकाला। उसे लेकर महादेव घाट पहुंचा। नौकरी और गृहस्थी के जंजाल में गणेशजी की एक झलक भी नहीं पा सका था। आज एक नजर देख लेना चाहता था। घाट के करीब हम दोनों दो घंटे एक जगह खड़े रहे। संयोग से मेरा दोस्त भी मेरी तरह सोचने वाला था। हम लोग ऐसी ही मुफ्त की चीजों में आनंद लेते थे। हम लोगों की विचारधारा है कि दौलत और उससे खरीदी जा सकने वाली चीजों की तरफ भागना ठीक नहीं है। मेरी तरह उसकी जेब में भी पैसे नहीं रहते। वह भी अपने घर का नालायक लड़का है। घाट पर मेला लगा था। न जाने कहां कहां से लोग चले आ रहे थे। ट्रालियों पर गणेश की प्रतिमाएं लेकर नाचते गाते लड़कों की टोलियां थीं। उनमें जवान भी थे और बच्चे भी। सिनेमा के गानों पर झूमते हुए। उन्हें मतलब नहीं था कि गानों का गणेशजी से कोई संबंध है कि नहीं। और लगता था कि इस बात से किसी को कोई मतलब नहीं था। कुछ टोलियां गणेश विसर्जित कर लौट रही थीं। जो लोग नदी में उतरे थे वे भीगे हुए कपड़े पहने हुए थे और उन्हें उतारना नहीं चाहते थे। घाट पर भीड़ बढ़ती जा रही थी। सिर पर गणेश की प्रतिमाएं लिए टोलियां आ रही थीं। कुछ बड़ी मूर्तियों को पांच सात लोग मिलकर ला रहे थे। किसी कोने में एक नवविवाहित जोड़ा बड़ी देर से गणेश की पूजा कर रहा था। कुछ संपन्न घरों के लोग अपनी चारपहिया गाडिय़ों से परिवार सहित आए। एक ही घाट पर सबको देखकर बहुत अच्छा लग रहा था। बच्चों का उत्साह तो देखते बनता था। कुछ टोलियां तो बच्चों की ही थीं। पता नहीं कितनी दूर से ठेलों पर प्रतिमाएं लेकर चले आ रहे थे। नंगे पांव। कुछ ने अपनी कमीजें भी उतार रखी थीं। यानी नदी में उतरने की तैयारी थी। आसपास रहने वाले बच्चों के लिए यह त्योहार रोजी रोटी लेकर आया था। वे पैसे लेकर छोटी मूर्तियों को विसर्जित कर रहे थे। कुछ बालक विसर्जित मूर्तियों के लकडिय़ों के ढांचे इक_ïा कर रहे थे। बड़ी मूर्तियां पुल पर खड़ी क्रेन की मदद से नदी में उतारी जा रही थीं। नीचे एक प्लेटफार्म पर खड़े गोताखोर उनकी जंजीरें खोलते और उन्हें विसर्जित कर देते। एक कोने में खड़े कुछ प्रेस फोटोग्राफर तस्वीरें ले रहे थे। वे पानी में उतरने को तैयार नहीं थे। उन्हें कोई पूछ भी नहीं रहा था। लोग यहां फोटो खिंचवाने नहीं आए थे। मेरा तनाव गायब हो चुका था। लगा कि अपने परिवार में लौट आया हूं। हम लोगों ने मांग मांग कर प्रसाद खाया। लोग बांटकर खुश हो रहे थे। वैसे आजकल बांटने वाले को पागल समझा जाता है। बटोरने वाले को होशियार। मैं एक और चीज देख रहा था। जिन्हें हम विपन्न कहते हैं उनके बलिष्ठï शरीर। कमीज उतार कर घूम रहे कुछ नौजवानों के बदन तो ऐसे थे मानो किसी कलाकार के तराशे हुए हों। दूसरी तरफ मैं था। मेरी कमीज के भीतर एक बीमार शरीर था। संभवत: डायबिटीज का शिकार। एक और बात मुझे रास्ते भर कचोटती रही। मैं क्यों इन बच्चों की तरह नाच नहीं सकता। चालबाजियों से भरी दुनिया से अलग यह एक खूबसूरत दुनिया थी जिसमें लोगों के दिल में उत्साह था, हाथ प्रणाम करने के लिए जुड़ रहे थे, सर श्रद्धा से झुक रहे थे, कदम एक तीर्थ यात्रा में शामिल थे। कोई किसी को डांट नहीं रहा था, किसी की टांग नहीं खींच रहा था, किसी की शिकायत नहीं कर रहा था। जिधर देखो उधर जयजयकार हो रही थी। मेरा मन नहीं कर रहा था कि इस दुनिया से लौटूं। लौटते वक्त मेरा भी मन कह रहा था- अगले बरस तू जल्दी आ।

कुछ बुद्धिजीवियों की

हाल ही में राजधानी में एक नाट्य महोत्सव संपन्न हुआ। राज्य के संस्कृति विभाग ने इसका आयोजन किया। इसमें मुम्बई, उज्जैन और कोलकाता के नाट्य दलों ने पांच नाटक पेश किए। बीच में एक दिन परिचर्चा का भी आयोजन किया गया। इस महोत्सव ने नगर के रंगकर्मियों, बुद्धिजीवियों और साहित्य-संस्कृति में रुचि रखने वाले लोगों को एक जगह एकत्र होने का एक अवसर दिया। नाटकों का जहां तक सवाल है मुम्बई की संस्था एकजुट के नाटक जस्मा ओडऩ और कोलकाता की संस्था रंगकर्मी की प्रस्तुति काशीनामा को छोड़कर शेष नाटक दर्शकों को बहुत पसंद नहीं आए। कम से कम तालियों के आधार पर ऐसा कहा जा सकता है। हिंदी रंगमंच के विस्तार पर परिचर्चा के दौरान रंगकर्मी सुभाष मिश्र द्वारा उठाया गया यह मुद्दा इस संबंध में काबिले गौर है। उन्होंने इस बात पर अफसोस प्रकट किया कि जिस दौर में किसान कर्ज में डूबे हुए हैं, हम ऐतिहासिक नाटक खेल रहे हैं। ऐतिहासिक नाटकों का महत्व अपनी जगह है। लेकिन सवाल प्राथमिकताओं का है। अगर दर्शकों ने जस्मा ओडऩ नाटक को पसंद किया तो इसकी एक वजह थी उसकी कहानी जिसकी नायिका एक मेहनतकश मजदूरनी है जो पति के लिए राजा का प्रस्ताव ठुकरा देती है और सबके साथ रहने के लिए स्वर्गदूतों को लौटा देती है। छत्तीसगढ़ नया नया राज्य बना है। जनता चाहती है कि राजा को मिट्टïी खोदना आना चाहिए। वह मेहनत की रोटी खाना पसंद करती है। वह सबके साथ मिलकर रहना चाहती है। उसे दूसरा कोई स्वर्ग नहीं चाहिए। उस रोज लगा कि मंच पर जस्मा नहीं बोल रही, छत्तीसगढ़ की कोई मजदूरनी बोल रही है। कोई कामकाजी लड़की बोल रही है। हमारे आसपास रहने वाले किसी गरीब आदमी की मेहनतकश और स्वाभिमानी बेटी बोल रही है। हाल में देर तक बजी तालियों के पीछे नाटक के कथानक व उसके संवादों का बड़ा योगदान था। यह नाटक छत्तीसगढ़ की वर्तमान परिस्थितियों से संबंध रखता था। परिचर्चा में दूसरा महत्वपूर्ण सवाल यह उठा था कि नाट्य महोत्सव में प्रदेश के किसी नाटक को जगह नहीं दी गई। बात ठीक थी। यहां के नाटक प्रदेश के बाहर जाकर पुरस्कार जीत कर लाते हैं। और यहां बाहर के नाटक बुलवाए जा रहे हैं। ऐसा नहीं कि लोग प्रदेश के नाटक रोज रोज देखकर तृप्त हो गए हों इसलिए बाहर के नाटक बुलाए गए हों। नाटकों का मंचन यहां कभी कभार होता है। जैसा कि नाटककारों ने बताया यहां कोई ऐसा प्रेक्षागृह नहीं जिसे नाट्यकर्मी अपना कह सकें। जो प्रेक्षागृह हैं उनमें ईको की समस्या है। उनका किराया बहुत ज्यादा है। वे मंचन के एक दिन पहले रिहर्सल के लिए भी नहीं खोले जाते। उषा गांगुली अनुभवी नाट्यकर्मी हैं। उन्होंने बताया कि नाटकों और नाट्यकर्मियों की ये समस्याएं सारी दुनिया में तकरीबन एक सी हैं। मुझे हाल ही में देखी एक फिल्म का जिक्र करना प्रासंगिक लग रहा है। ब्राइड एंड प्रीज्यूडिस में गोआ के एक दृश्य में संवाद है कि भारत को देखने के लिए पैसा नहीं लगता और अगर आपके पास पैसा है तो आप भारत नहीं देख सकते। कवियों, लेखकों, नाटककारों के साथ भी शायद यही बात है। अगर वे सुविधाओं के बारे में सोचने लगें तो उनकी रचनात्मक स्वतंतत्रता पर इसका असर पड़ता है। हालांकि कुछ लोग दोनों को साध लेते हैं। कुछ समस्याएं कलाकारों और कलाकार बिरादरी की भी हैं। इनमें एकजुटता नहीं है। अलग अलग खेमे हैं। कुछ के अपने आर्थिक हित हैं। कुछ की राजनीतिक प्रतिबद्धताएं हैं। कुछ के व्यक्तिगत अहम हैं। नगर में एक थिएटर बन भी गया तो इस बात के लिए तनातनी होने लगेगी कि उस पर कब्जा किस खेमे का हो। उसमें किस विचारधारा के नाटक खेले जाएं किस विचारधारा के नहीं। कोई लाइब्रेरी खुल गई तो झगड़ा होगा कि कौन की किताबें मंगवाई जाएं इसका फैसला कौन करेगा। किससे मंगाई जाएं यह भी झगड़े का विषय होगा। एक बुजुर्ग रंगकर्मी ने यह बात उठाई कि समीक्षा का काम कम होता जा रहा है। जो लोग नाटकों पर लिख रहे हंैं वे नाटकों के बारे में जानते नहीं। वे समीक्षा नहीं रिपोर्टिंग करते हैं। मैं अच्छे समीक्षकों को नहीं जानता। लेकिन अखबारों में किताबों की समीक्षाएं पढ़कर मैंने इतना समझा है कि इन्हें न छापना ही ठीक है। समीक्षाएं उन किताबों की होती हैं जो सामान्यत: पाठकों तक कभी नहीं पहुंचतीं या पाठक उन तक कभी नहीं पहुंचता। लेखक किताब के बारे में कम, अपने बारे में ज्यादा लिख मारते हैं। वे समीक्षा किसके लिए लिख रहे हैं यह कई बार स्पष्टï नहीं हो पाता। इन्हें पढऩा अपना समय खराब करना है। अखबार ऐसी समीक्षाएं क्यों छापे। कोई छोटा दूकानदार भी किसी निठल्ले आदमी को अपनी दूकान पर क्यों बैठने देगा जिसे देखकर आता हुआ ग्राहक भी बीच रास्ते से लौट जाए? नाटकों की अच्छी समीक्षा कोई लिखे, आम पाठकों के बीच लोकप्रिय होने लायक लिखे तो कोई भी अखबार उसे छापना चाहेगा। एक वाक्य उषा गांगुली ने कहा- नाटक एक ऐसा माध्यम है जिसने अपने को पूरे का पूरा बाजार में नहीं ला खड़ा किया है। उन्होंने चाहे जिस अर्थ में यह बात कही हो लेकिन मेरा खयाल है नाटककारों को बाजार से मुंह नहीं चुराना चाहिए। उन्हें अपने को बाजार में लाकर खड़ा कर देना चाहिए। बाजार में स्पर्धा है। बाजार में अपना माल बेचने की गरज है। बाजार में रिस्पांस का पता चलता है। बाजार से नफरत करने के कारण ही ऐसे ऐसे नाटक मंचित हो जाते हैं जिनके खत्म होने का पता तब चलता है जब सारे कलाकार हाथ जोड़कर स्टेज पर आ खड़े होते हैं। एक तर्क बड़ा चला हुआ है कि दर्शक अश्लीलता देखना चाहते हैं। अगर यह सही होता तो भौंडी फिल्में सबसे ज्यादा कमाई करतीं। या कोई अश्लील फिल्म किसी थिएटर में लगातार चार साल चलती। अगर यह तर्क सही होता तो चरणदास चोर की लोकप्रियता के बारे में आप क्या तर्क देंगे? दर्शकों से भी एक बात कही जा सकती है कि उन्हें नाटककारों से संवाद स्थापित करना चाहिए। लोग तारीफ तो ुखुलकर करते हैं पर कमियों की चर्चा करने से हिचकते हैं। कुछ अरसा पहले शहर में हबीब तनवीर के कुछ नाटक खेले गए। एक नाटक के संवाद बड़ी तेजी से बोले जा रहे थे। मुझे कुछ भी समझ में नहीं आया। कुछ देर तक मैं यह सोचकर बैठा रहा कि गलती मुझी में होगी। बाद में आसपास के कुछ लोगों ने एक दूसरे से खुसुर फुसुर की कि संवाद समझ में नहीं आ रहे हैं। पता नहीं हबीब जी से यह बात किसी ने कही कि नहीं। मुक्तिबोध की कविताओं पर आप किसी बुद्धिजीवी से चर्चा करें तो वे बहुत जल्दी बिगड़ जाते हैं। क्या आपको इन कविताओं का अर्थ समझ में आया, यह सवाल उन्हें बड़ा खराब लगता है। मेरे कुछ परिचितों को तो आश्चर्य हुआ कि मुक्तिबोध को लेकर कोई ऐसे सवाल उठा सकता है। हालांकि उन्होंने स्पष्टï किया कि जिन कविताओं को लेकर चर्चा चल रही है वे उनकी भी समझ में नहीं आईं।

(कुछ साल पहले लिखा गया लेख)

तस्लीमा नसरीन मेरे शहर में

तस्लीमा नसरीन मेरे शहर में आई और लौट गई। उसके आने की खबर कई दिन पहले से थी। मन में उत्सुकता तो थी कि देखें करीब से कि वह किस मिट्टïी की बनी है, बोलती कैसा है, क्या बोलती है और आखिर वह है क्या चीज जिसकी वजह से सारी दुनिया के कट्टïरपंथियों ने उसके खिलाफ फतवे दे रखे हैं। कोई उसके मुंह पर कालिख पोतने वाले को इनाम देने के लिए तैयार खड़ा हुआ है तो कोई उसे मुर्दा देखना चाहता है। मैंने तस्लीमा को करीब से देखा। वह आसमान से उतरी कोई देवी नहीं थी। उसमें कोई सुरखाब के पर नहीं लगे हुए थे। उसके हाथों में जादू की छड़ी नहीं थी। लेकिन वह दुनिया भर में जुल्म के खिलाफ आवाज बुलंद कर रही है। मुझे अपने आप पर बड़ी शर्म आई। हम लोग एकदम नाकारा लोगों की तरह जी रहे हैं। दफ्तर में बॉस की, सड़क पर पुलिसवाले की और जहां तहां जिसकी तिसकी झिड़कियां और डांट सुनते हैं और चुप रह जाते हैं। जुल्म करने वाले के खिलाफ उंगलियां उठती नहीं और अपने ही भाइयों की टांग खींचते रहते हैं। तस्लीमा को देखकर मैंने सोचा- हमें भी लडऩा चाहिए। जब यह बेचारी लड़ सकती है तो हम मुस्टंडे क्यों नहीं लड़ सकते। मुझे मालूम था तस्लीमा के जाने के बाद फिर मैं अपनी पर लौट आऊंगा। मैंने देखा-वह भी हम लोगों की तरह हाड़ मांस की पुतली है। एकदम आम इंसानों की तरह जो स्टेशन पर लेने आए लोगों को देखकर चहक उठती है। दुनिया भर में मशहूर लेखिका को इस तरह रायपुर के रेलवे स्टेशन पर देखना एक ऐतिहासिक अनुभव था। तस्लीमा मेरे शहर में दो तीन दिन रही। उसने यहां कविताएं भी पढ़ीं और अपना वक्तव्य भी पढ़ा। इंटरव्यू भी दिए। लेकिन उनसे पूछे जाने वाले सवालों में कुछ भी नया नहीं था।उससे इस तरह के सवाल हजार बार किए जा चुके होंगे। तस्लीमा के बारे में चर्चा करने वाले बहुत से लोगों ने मुझसे बताया कि उन्होंने तस्लीमा की कोई किताब नहीं पढ़ी है। इनमें से कई ऐसे थे जो ज्यादातर समय इस बात में खपा रहे थे कि वह कैसी दिखती है और उसके कितने लोगों से ताल्लुकात हैं। तस्लीमा से मिलने के लिए इस शहर की वे औरतें नहीं आईं जो फुर्सत मिलने पर काव्य गोष्ठिïयां और अपने सुभीते से आंदोलन करती हैं। बुक स्टालों पर कभी कभार दिख जाने वाले चेहरों में से भी अधिकतर ऐसे थे जो किसी न किसी काम में मसरूफ थे। मेरे एक दोस्त ने बताया कि उसने तस्लीमा को किताब मेले मे ंलगभग अकेले खड़े देखा। बहुत कम लोग उसके आसपास थे। जो थे उनमें से कम ही ऐसे थे जो तस्लीमा के वहां होने के कारण आए थे। तस्लीमा की किताबें भी स्टाल पर थीं। उसके रहते उसकी किताबें बिकीं लेकिन उसके जाते ही वहां सन्नाटा छा गया। मैंने राजेश जोशी की एक कविता कभी पढ़ी थी। इसमें वसंत शहर में आता है। उसे कोई पहचानता नहीं। कोई ऐसा पेड़ उसे नहीं दिखता जिसे वह हरा भरा कर दे। उदास और थका हुआ सा वहां से वसंत लौट जाता है। तस्लीमा भी ठीक उसी तरह मेरे शहर में आई और लौट गई।
तस्लीमा को यह देखकर दुख हुआ होगा कि उससे पूछने के लिए यहां सवाल भी नहीं हैं। प्लेटफार्म पर स्वागत के बाद उसे मीडिया ने घेर लिया। एक लंबा सा सवाल उससे किया गया जो इतना लंबा था कि उसका अनुवाद करने वाले को उसका सार निकालकर तस्लीमा को बताना पड़ा। तस्लीमा ने कुछ देर तक सोचा और जवाब दिया कि इतने गंभीर सवाल पर प्लेटफार्म पर चर्चा शायद नहीं हो पाएगी। इस पर बाद में चर्चा करेंगे। दूसरा सवाल था- आप रायपुर के बारे में कुछ बोल दीजिए। जवाब मिला- अभी तो आए हैं। पहले देख लें फिर बोलेंगे। वह कुछ आगे बढ़ी तो कुछ और पत्रकार उसके साथ हो लिए। उससे उसकी आत्मकथा को लेकर उठे विवाद के बारे में पूछा गया। वह हजार बार इस सवाल के जवाब दे चुकी होगी। उसकी भलमनसाहत कि उसने एक बार और इसे दोहरा दिया। अगला सवाल कट्टïरपंथियों के बारे में था। इसका जवाब वही था जो कट्टïरपंथ से पंगा लेने वाला कोई भी आदमी या कोई भी औरत दे सकती थी। तस्लीमा को शहर में सबसे ज्यादा सवालों की कमी खली होगी।
(तसलीमा नसरीन के रायपुर प्रवास की एक याद)

दोबारा मत पूछना

हाल ही में मेरी एक परिचित से बात हो रही थी। उन्होंने मुझसे पूछा- आप कहां तक पढ़े हो? आमतौर यह सवाल मुझसे कोई पूछता नहीं। मेरे परिचितों में इस तरह के सवाल पूछने वाले लोग नहीं हैं और मुझे किसी से ऐसा कोई काम नहीं पड़ता कि कोई मुझसे पूछे कि आप कहां तक पढ़े हो। मैं कभी किसी से पूछता भी हूं तो यह नहीं पूछता कि कहां तक पढ़े हो। मैं कई लोगों से यह पूछ चुका हूं कि कौन सा सब्जेक्ट लेकर पढ़ाई की। यह सवाल मैं ऐसे मौकों पर पूछता हूं जहां किसी से ऐसा कोई काम पड़ जाए। अपने पास बॉटनी की कोई गुत्थी है तो बेहतर है कि यह जानकर ही किसी से पूछा जाए कि उसने बॉटनी की पढ़ाई की है या नहीं। किसी को इतिहास से संबंधित कोई सवाल देने से पहले जान लेना बेहतर होता है कि उसने इतिहास पढ़ा है कि नहीं। लेकिन मेरे परिचित ने यह जानने के लिए पूछा था कि पढ़ाई लिखाई के हिसाब से मेरा कद क्या है। मैंने कहा-अगर आप यह जानना चाहते हैं कि मेेरे पास डिग्री कौन सी है तो मैं मैट्रिक पास हूं। उन्होंने कहा- मैं विश्वास नहीं कर सकता। मैंने उन्हें विश्वास दिलाया कि मेरे पास मैट्रिक से बड़ी डिग्री नहीं है। उनकी आंखों में दया उतर आए इससे पहले ही मैंने उनसे कहा- आपको विश्वास क्यों नहीं हो रहा है? क्या आपको लग रहा है कि मैट्रिक पास होने के कारण मैं कम काबिल हूं? और आप पोस्ट ग्रैजुएट होने के कारण मुझसे ज्यादा जानते हैं? उन्होंने घबराकर कहा- मैं ऐसा नहीं कह रहा हूं। वे घबराए इसलिए कि उनके एक पेज के लेख में मैं पचीस पचास गलतियां निकाल चुका था। और जिस वक्त वे मुझसे बात कर रहे थे मैं टूटी फूटी अंग्रेजी में मिशिगन में बैठे अपने एक रिटायर्ड मित्र से बात कर रहा था। इंटरनेट पर एक दूसरे की खींची तस्वीरें देखकर हमारी दो दिन पहले दोस्ती हुई थी और हमें लग रहा था कि हम एक दूसरे को अच्छी तरह जानते हैं। मिशिगन में बैठे मेरे इस मित्र की पत्नी रिटायर्ड टीचर हैं और मैंने उन्हें बताया था कि मेरी मां भी स्कूल में पढ़ाती थीं और हाल ही में रिटायर हुई हैं। उन्होंने मुझे अपने बेटे के बारे में बताया जो किसी और शहर में नौकरी करता था और उसे कंप्यूटर व फोटोग्राफी के बारे में काफी पता था। मिशिगन वाले दोस्त बहुत प्यारी बातें करते हैं। उनकी चर्चा मैं आगे करूंगा। मुझसे मेरे परिचित ने पूछा- आप खुद को मैट्रिक पास कहते हो और आपकी अंग्रेजी इतनी स्ट्रॉंग है? मैंने कहा- आप अंग्रेजी अच्छी तरह जानते हैं? उन्होंने कहा- नहीं। मैंने पूछा-जब आपकी अंग्रेजी अच्छी नहीं है तो आप यह कैसे तय कर सकते हैं कि मेरी अंग्रेजी स्ट्रांग है? मैं आपसे ज्यादा जानता होऊंगा, या यह कहना ज्यादा सही होगा कि आप मुझसे कम जानते होंगे लेकिन मेरी अंग्रेजी के बारे में तो वह तय करेगा जिसका अंग्रेजी पर अधिकार हो। मेरे पोस्ट ग्रैजुएट परिचित मेरी बात से सहमत हुए। उन्होंने मेरे तर्क की तारीफ की लेकिन डिग्री से कद तय करने की अपनी सोच से वे फिर भी नहीं उबर पा रहे थे। उनकी ईमानदारी की तारीफ करनी पड़ेगी, उन्होंने स्वीकार किया कि वे अपनी सोच से अभी भी उबर नहीं पा रहे हैं। मैंने कहा-सचिन तेंदुलकर के लिए आपके दिल में ज्यादा इज्जत नहीं होगी क्योंकि मेरा खयाल है कि उन्होंने भी कोई बड़ी डिग्री हासिल नहीं की है। और मदर टेरेसा भी आपके आगे पानी भरती होंगी? मैंने अनुमान से ऐसे बहुत से लोगों के नाम लिए और उनसे पूछा-इनमें से कितने लोग इस बात के लिए जाने जाते हैं कि वे पोस्ट ग्रैजुएट थे या हैं? दुनिया में कोई सफल, काबिल, मशहूर व्यक्ति इसलिए नहीं जाना पहचाना जाता कि वह पोस्ट ग्रैजुएट है। मैंने उन्हें बताया कि पोस्ट ग्रैजुएट होना आजकल बहुत आसान है। मंैने उन्हें यह भी बताया कि जिस विश्वविद्यालय से वे पढ़े हैं वहां से पढ़े लिखे लोगों को यहां से बाहर इज्जत नहीं मिलती। उनकी डिग्री पर बहुत ज्यादा भरोसा नहीं किया जाता। मैंने तो यह भी सुना है कि उन्हें नौकरी पर लेने से पहले उनकी अलग से परीक्षा ली जाती है। और मैं जितने ग्रैजुएट-पोस्ट ग्रैजुएट को जानता उनका स्तर देखकर मुझे लगता है कि इनकी परीक्षा जरूर ली जानी चाहिए। मैंने उनसे कहा- पद को लेकर भी आप किसी के कद का अनुमान नहीं लगा सकते। पद चापलूसी के कारण भी मिलते हैं, रिश्तेदारी के कारण भी, कभी कभी नाकाबिल होने के कारण भी पद मिल जाता है। मैं ऐसे संपादकों को जानता हूं जिनकी भाषा में इतनी गलतियां हैं जितनी मैंने स्कूल में पढ़ते समय भी नहीं कीं। मैंने उन्हें बताया कि इस शहर में बहुत से बच्चे बूट पॉलिश करते घूमते रहते हैं। बहुत से बच्चे प्लास्टिक बीनते हैं। कुछ बालिकाएं ठेला खींचने में अपने मां बाप की मदद करती हैं। कुछ कम उम्र लड़कियां रेजा का कम करती हैं। कुछ विकलांग घूम घूम कर छोटी मोटी चीजें बेच कर घर चलाते हैं। कुछ घिसट घिसट कर चलने वाले भी अपनी रोटी खुद कमाते हैं। इनमें से शायद ही कोई पोस्ट ग्रैजुएट हो। और कितने ही पोस्ट ग्रैजुएट मां बाप की छाती पर मूंग दलते रहते हैं। मैं तो भीख मांगने वालों को भी मेहनती और उद्यमी गिनता हूं। यह आसान काम नहीं है। यह अलग बात है कि कहीं और मर्दानगी नहीं दिखा पाने वाला हमारा कुंठित समाज उन्हें झिड़ककर बड़ा बन जाता है। और खुद गणेेश और दुर्गा के नाम पर हाथ फैलाता है या फैले हुए हाथों पर डर कर इंक्यावन रुपए डाल देता है। मित्रो। अधिक न पढ़ पाने का मुझे बहुत अफसोस है। पढऩे से जानकारियां मिलती हैं। अच्छी किताबें पढऩे से नजरिया मिलता है। सोच का दायरा बड़ा होता है। सही गलत की समझ पैदा होती है। लेकिन मुझे इस बात का कतई अफसोस नहीं है कि मेरे पास ऐसी कोई डिग्री नहीं है जिसका मैं हकदार नहीं हूं।

एक दोस्त से मुलाकात

उस रोज सुबह मैं घूमने निकला तो एक दोस्त मिल गया। उससे बड़ी देर तक बातें हुईं। वह जल्दी में नजर आ रहा था लेकिन बातें खत्म नहीं हो रही थीं। उसने करीब दस बार मुझसे हाथ मिलाया और दस बार कहा-अच्छा चलते हैं। लेकिन हर बार, वह फिर रुक जाता था। पिछले पंद्रह दिनों से मैं काम छोड़कर बैठा हूं। दोस्त मुझे अपने प्रेस में काम करने की सलाह और आमंत्रण दे रहा था। उसने अपने प्रेस के बारे में बहुत सारी बातें बता डालीं। सारी दुनिया में, वह उन कुछ लोगों में से था जिन्होंने मुझसे इस दौरान बात की, हिम्मत दी, सलाह दी, रास्ते सुझाए और मदद की पेशकश की। आज मैं उसके बारे में एक लंबा किस्सा लिख सकता हूं। मेरा वह दोस्त एक उग्र हिंदूवादी संगठन का सदस्य है। लेकिन मेरे लिए दोस्त है। उसने आज संपादक पर कुर्सी फेंकने और एक सहकर्मी से मारपीट करने का किस्सा भी सुनाया। मैंने उससे कहा-तुमसे मिलने तुम्हारे प्रेस आऊंगा लेकिन मुझ पर कुर्सी मत फेंकना। उसने कहा- कुर्सी मैं संपादकों पर फेंकता हूं, तुम पर नहीं फेंकूंगा। दोस्त ने अपने एक और सहकर्मी के बारे में बताया। वह भी ऐसे ही संगठन का सदस्य है और मारपीट करता है। दोस्त से इस मुलाकात ने मुझे रिश्तों की अहमियत के बारे में लिखने की प्रेरणा दी है। उसने बताया कि कुछ साल पहले वह मुझसे इसी हालत में मिला था। नौकरी तलाश रहा था। वह ऐसे किसी प्रेस में जाने की सोच रहा था जिसमें मैं पहले काम कर चुका था और वहां के लोगों को बहुत अच्छी तरह जानता था। मैंने उसे उस प्रेस के बारे में बहुत उपयोगी जानकारी दी, उसकी हिम्मत बंधी और उसने उसी दिन जाकर प्रेस के जिम्मेदार लोगों से बात की और उसे नौकरी मिल गई। मुझे यह बात याद नहीं थी। दोस्त ने न सिर्फ बात याद दिलाई बल्कि उसका बदला भी दिया। मैं उसके प्रेस में नौकरी मांगने जाऊं न जाऊं यह अलग बात है। दोस्त से मुलाकात ने मुझे पिता की अहमियत के बारे में भी लिखने का मौका दिया है। पंद्रह दिन पहले दोस्त के पिता का देहांत हो गया। उनके कार्यक्रम के बाद वह आज पहली बार घर से बाहर टहलने निकला था। पिता को याद कर वह भावुक हो रहा था और उनकी कमी महसूस कर रहा था। संपादक पर कुर्सी फेंकने वाले को इस कदर भावुक होते देखना अच्छा नहीं लगा। मैंने उसे समझाया कि यह तो रिले रेस है। पिता ने बहुत सी जिम्मेदारियां तुम्हें दी हैं। उन्हें आगे बढ़ाना तुम्हारा काम है। आज सुबह की सैर ने मुझे लिखने का एक और विषय दिया है। मैंने जगह जगह इडली के ठेले देखे। गर्मागर्म इडलियां बन रही थीं। लोग भीड़ लगाए खड़े थे। मेरे मन में लंबे समय से यह बात है कि छत्तीसगढ़ में जगह जगह साहू ढाबा या इडली सेंटर मिल जाएंगे। छत्तीसगढ़ी खान पान के ठेले और होटल क्यों नहीं मिलते? अंतरराष्टï्रीय स्तर पर खान पान का अनुमान लगा पाना मेरे बस का नहीं है लेकिन छत्तीसगढ़ी भोजन में वह स्वाद है जो कम से कम राष्टï्रीय स्तर पर उसे एक पहचान दिला सकता है। वह देश के सभी प्रदेशों में खान पान का एक जरूरी हिस्सा बन सकता है। घूमने के लिए जगन्नाथ पुरी जाने वाले लौटकर बताते हैं कि ढंग का दाल भात खाने के लिए तरस गए। पड़ोस के उड़ीसा में यह हाल है। दक्षिण भारत की एक यात्रा के दौरान भी छत्तीसगढ़ का भात दाल साग याद आता रहा। रायपुर में अगर साउथ इंडियन डिश की तरह अंगाकर, चीला और फरा के स्टाल खुल जाएं तो खूब चलेंगे। सरकार से अगर यह उम्मीद की जाए कि वह छत्तीसगढ़ी खाने को प्रमोट करे तो प्रमोट करने वाले पैसा खा जाएंगे, सत्ता के आसपास दलालों की भीड़ के बारे में जो चर्चा सुनने में आती है उसके आधार पर तो यही अनुमान लगाया जा सकता है। राज्योत्सव में छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का स्टाल इतना छोटा होता है मानो वह हजारों किलोमीटर दूर किसी मेहमान राज्य का स्टाल हो जिससे कोई फायदा नहीं होना हो। राज्योत्सव में तो केवल भात दाल सब्जी का एक महा स्टाल होना चाहिए जिसमें तरह तरह के चावल और तरह तरह की सब्जियां होनी चाहिए। छत्तीसगढ़ी स्टाइल की। मारवाड़ी, गुजराती और पंजाबी खाने के भी बड़े बड़े स्टाल रहें। लेकिन वे वहां के पारंपरिक भोजन के स्टाल होने चाहिए। राज्योत्सव में खाने पीने के स्टाल खाने का मजा कम देते हैं, बेवकूफ बनाने की दूकान ज्यादा लगते हैं। शहर पर बाजार हावी है। वह किस कदर शातिर और आक्रामक हो रहा है यह गाहे ब गाहे महसूस होता रहता है। शहर में कुछ अरसा पहले महाराष्टï्र का एक महानाट्य आया था। दर्शकों में हम पति पत्नी भी थे। दोनों खाने पीने के शौकीन। वहां खाने की एक ही चीज मिल रही थी-पॉपकॉर्न। कुछ लोग बक्सों में भर भर कर इन्हें बेच रहे थे। एक बक्सेवाले को हमने भी बुलाया लेकिन इतना महंगा पॉपकॉर्न लेने का दिल नहीं हुआ। पॉपकॉर्न खाने के बाद लोगों को जमकर प्यास लगी। थोड़ी देर बाद पॉपकॉर्न बेचने वाले लोग ही पानी की बोतलें और कोल्ड ड्रिंक लेकर आ गए। वह भी खूब बिका। समझदार पत्नी ने घर से चलते वक्त पानी की एक बोतल बैग में रख ली थी। उसे थोड़ा थोड़ा पीते हुए हमने नाटक देखा। सुना है शहर के एक मॉल में एक थिएटर है। वहां खाने पीने का कुछ भी ले जाना मना है। जो खाना पीना है, वहीं से खरीदकर खाओ-पिओ। सब कुछ महंगा महंगा। मैंने कहीं बिहार के एक ढाबे के बारे में पढ़ा था कि वहां हर गाड़ी वाले को रुककर पैसा देना पड़ता है। खाओ या न खाओ, आपकी मर्जी। कितने नौसिखिए हैं वे लोग जो आंखों में मिर्च झोंककर लोगों को लूटते हैं। राजधानियों में बगैर नीबू मिर्च के यह काम रात दिन होता है। लोग लुटकर खुश हैं। वे आधुनिक जो बन रहे हैं। राजा को कौन बोले कि वह नंगा है। पैसे वालों को कौन बताए कि मॉल में तुमने जो खाया वह तुम्हें अच्छा नहीं लगा। लोग डरते हैं कि ऐसा कहा तो बेवकूफ माने जाएंगे। मॉडर्न आर्ट जैसी स्थिति है। आर्ट को उल्टा टांग दो तो भी कलाप्रेमी वाह वाह करते हुए निकलेंगे। बात कहां से शुरू हुई, कहां पहुंच गई। सुबह की एक छोटी सी सैर ने पिछले पंद्रह दिनों की उदासी और अकेलेपन को धो दिया। हालांकि असली तीर्थयात्रा तो मुझे अब करनी है, नौकरी की तलाश में।

वह दस नम्बर जर्सी की हक़दार है

वह एक यादगार शाम थी।
मैं प्रेरणा मिश्रा के बारे में कुछ नहीं जानता था। लेकिन अब मैं उसे जानता हूं। और मुझे खुशी है कि मैं इसी शहर में रहता हूं जिसमें वह रहती है।
वह रायपुर की एक स्कूली लड़की है। वह एक बहुत अच्छी फुटबॉलर है।
रायपुर में और भी लड़कियां फुटबॉल खेलती होंगी। मैं उन्हें नहीं जानता। लेकिन उस रोज मैदान पर जितनी लड़कियां खेल रही थीं, उनमें वह सबसे तेज थी। सिर्फ लड़कियों में नहीं, लड़कों में भी मुझे उस जैसा कोई खिलाड़ी उस रोज नजर नहीं आया।
मौका था खेल विभाग के फुटबाल शिविर के समापन का। सप्रे मैदान में इस अवसर पर लड़के और लड़कियों के बीच मैच रखा गया था।
प्रेरणा को देखकर यह तो लगता था कि वह खेल सकती है लेकिन यह नहीं मालूम था कि वह इतना अच्छा खेलेगी। खेल शुरू हुआ तो वह मामूली लड़कियों की तरह खेलती दिखी। फिर जैसे जैसे खेल परवान चढ़ा, उसके भीतर की प्रतिभा दिखने लगी। उस रोज किसी और खिलाड़ी ने इतनी भागदौड़ नहीं की होगी जितनी उसने की। गेंद ज्यादातर लड़कियों के हाफ में दबी रही इसलिए मैं दावे से नहीं कह सकता कि वह बैक में खेल रही थी या हाफ की पोजीशन से, लेकिन उसने अपने हाफ में पूरा मैदान संभाल रखा था और गेंद लेकर विपक्षी के पाले में भी जा रही थी। बॉल छिनने के बाद विरोधी डिफेंडर से भिडऩा है कि तेजी से अपने हाफ में लौटना है, इसका जबरदस्त सेंस मैंने उसमें देखा। पहले हाफ में तो वह पहली ही बार में गेंद को क्लीयर करने की भूमिका अधिक निभाते दिखी लेकिन दूसरे हाफ में मैंने उसकी ड्रिब्लिंग और डॉजिंग देखी। अपनी टीम को गोल न कर पाते देख वह शायद फॉरवर्ड के रूप में टीम की मदद करना चाहती थी।
फुटबॉल में खिलाडिय़ों के बीच जबरदस्त टक्कर होती है। मुझे देखकर बहुत अच्छा लगा कि लड़कियां विपक्षी से टकराने में बिलकुल नहीं झिझक रही थीं। लड़कों ने भी जानबूझकर गिराने वाला खेल नहीं खेला। वहां बहुत सीरियस फुटबॉल हो रहा था। फुटबाल में कभी कभी गेंद को अपने कब्जे में करने या रखने के लिए विरोधी को कंधे से धकियाना भी पड़ता है। लड़कियों ने यहां भी हौसला दिखाया। उनकी टीम को कुछ अच्छे फॉरवर्ड मिल जाते तो नतीजा कुछ और होता। लड़कियां 3-0 से हारीं। लेकिन इस रिजल्ट से मैच की यह सच्चाई जाहिर नहीं होती कि लड़कों को इसके लिए कितना संघर्ष करना पड़ा। और इसीलिए गोल करने के बाद कैसे वे खुश हुए मानो विश्वकप में गोल मार लिया है।
वह एक यादगार शाम थी। उसमें मैंने लड़के लड़कियों की बराबरी की सुंदर मिसाल देखी। लड़कियों की ताकत का नमूना देखा। खेल मंत्री लता उसेंडी उस दौरान मौजूद थीं। वे खुद महिलाओं की ताकत की मिसाल हैं। हिंदी तो वे अच्छी बोल ही लेती हैं, अपने इलाके की बोली में वे और भी धाराप्रवाह बोलती हैं। डा. रमन सिंह की विकास यात्रा के दौरान कोंडागांव में मंच से उनका ओजस्वी भाषण सुनने को मिला था। राजधानी के लोगों को उन्हें उनके इलाके में सुनना चाहिए। लड़कियों की ताकत की एक और मिसाल फुटबॉल की कोच सरिता कुजूर हैं जिन्होंने प्रेरणा समेत दर्जनों लड़कियों को तैयार किया है।
धमतरी में मैंने कलात्मक खेल खेलने वाले खिलाडिय़ों को बरसों देखा है। रायपुर में वैसे खिलाड़ी मुझे देखने को नहीं मिले, शायद इसलिए कि खेल मैदानों पर मेरा जाना कम होता है। एक बार आरकेसी के बच्चों को ऐसा फुटबॉल खेलते देखा था और एक बार लाखे नगर में भिलाई की एक टीम को जिसमें ज्यादातर किशोर उम्र खिलाड़ी लगते थे। प्रेरणा के खेल में मुझे फिर वही ड्रिब्लिंग, पासिंग और मूव बनाने वाला खेल दिखा। तनाव के क्षणों में भी कूल होकर गेंद निकालने की मेहनत दिखी। स्टाइलिश और दमदार किक दिखी। प्रेरणा को उसके खेल के लिए बधाई, शुभकामनाएं और शुक्रिया। वह वाकई दस नंबर जर्सी की हकदार है।

Wednesday, June 10, 2009

सैर के वास्ते थोडी सी फजा और सही

आज आर एस एस के एक कार्यक्रम में जाना हुआ। वक्ता प्रकाश सोलपुरकर ने हिंदू मुस्लिम एकता की बात निकाली और कहा कि पहले हिंदू समाज एक हो जाए।

उन्होंने अपने भाषण में यह बतलाने का प्रयास किया कि इस देश में रहने वाले मुस्लिम भी हिंदू ही हैं। मुझे एक बात खटकी कि मुसलमानों को आप भाई कह रहे हो तो पहले हिंदू समाज एक हो जाए कहने का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि हिंदू समाज मुस्लिम समाज से अलग है?

मेरे ख्याल से जब आप देश और समाज की चिंता कर रहे हैं तो एकता की सोच में हिंदू मुस्लिम दोनों शामिल होने चाहिए।

श्री सोलापुरकर ने एक जगह कहा-एक समय था जब हमी हम थे।
एक शायर ने कहा है-
चमन में इत्तेफाके रंगो बू से बात बनती है
तुम्ही तुम हो तो क्या तुम हो, हमी हम हैं तो क्या हम हैं।

अपने इतिहास और परम्परा से हम बहुत कुछ जानते-सीखते है। अपने महान इतिहास से उन्हें नयी पीढी को देने लायक प्यार का कोई सबक नही मिला? नफरत हमें कमज़ोर बनाती है। नफरत पर आधारित अखंड भारत कैसा होगा?

वक्ता ने कहा कि संघ की शाखा में मुसलमानों के आने पर रोक नहीं है। लेकिन भाषण सुनकर मुझे लगा कि बोलने वाले के दिल में उनके लिए जगह नही है।

मिर्जा गालिब का ये शेर मुझे बहुत अच्छा लगता है-

क्यूँ न दोजख को भी जन्नत में मिला लें या रब
सैर के वास्ते थोडी सी फजा और सही।

Thursday, March 26, 2009

घर पर इन्टरनेट

घर पर इन्टरनेट लग गया है। बड़ा अच्छा लग रहा है। अब सोचना है कि इसका क्या करना है। एक ज़माने में लोग पड़ोसी को देखकर फ्रिज खरीद लेते थे और फ़िर सोचते थे कि इसमे क्या रखना है। नई चीजों और पुराने लोगो के बीच ऐसा होता रहता है।
फ्लिकर पर मेरी खीची हुई तस्वीरे है। अपनी इस गैलरी को और सवारुंगा। सर्फिंग करूँगा और नेट की दुनिया के बारे में जानूंगा। लोगो के ब्लॉग पढूंगा और अपने ज्ञान बढाऊंगा। ब्लॉग पर हिन्दी फॉण्ट के उपयोग के बारे में सीखूंगा।
बाय।

Thursday, March 5, 2009

माँ को कोई कैसे भूल सकता है?

कल माँ का फ़ोन आया था। उसने कहा- बहुत दिन से बात नही हुई। बिल्कुल भूल गया। माँ को भूला नही हूँ। लगभग रोज याद करता हूँ। लेकिन कई बार यह जताना पड़ता है कि हम याद कर रहे हैं। माँ को कोई कैसे भूल सकता है? माँ हमारे भीतर होती है। हम चाह कर भी उससे दूर नही हो सकते। समय समय पर माँ की याद आती रहती है। कुदरत ने याद भी क्या खूब चीज़ बनाईं है। जब हम एक दूसरे से दूर होते हैं तो याद हमें जोड़ती है। याद एक खूबसूरत चीज़ है। लेकिन कभी कभी सिर्फ़ याद से काम नही चलता। माँ कभी प्यास लगने पर सोचती होगी कि बेटे के हाथ से पानी मिल जाता तो कितना अच्छा होता। पानी तो उसे और कोई भी दे सकता है लेकिन माँ इसी बहाने ख़ुद को यह भरोसा दिलाना चाहती है कि उसका बेटा उसके साथ है। वह दुनिया को बताना चाहती है कि उसका बेटा कितना लायक है। माँ को यह अच्छा नही लगता कि मै ज़मीन पर सोऊ । भले ही इसके लिए डॉक्टर ने कहा हो। माँ को अच्छा नही लगता कि कोई मुझे कुछ करने से रोके। बात बात पर टोके। माँ मेरे मन की शान्ति चाहती है। वह जानती है कि मुझे शान्ति चाहिए। यह इस रिश्ते की एक ख़ास बात है। वैसे यह किसी भी रिश्ते के लिए ज़रूरी है कि आप सामने वाले की ज़रूरत को समझें। ख़ास रिश्ते वे होते हैं जब हम यह सब बताये बगैर समझ जाते हैं। माँ बेटे का रिश्ता ऐसा ही होता है।

Friday, February 27, 2009

भेडिय़ा तो उधर है साहब..

वैलेंटाइन्स डे को लेकर एक बार फिर समर्थन और विरोध सामने आया है। कुछ लोग हर साल कानून हाथ में लेने का ऐलान करते हैं, तोड़ फोड़ और मारपीट करते हैं। कानून के रखवालों, कानून बनाने वालों का पक्ष प्रभावी तरीके से सामने नहीं आता। डा। रमन सिंह जैसी साफ सुथरी छवि वाले मुख्यमंत्री के राज में कुछ लोग कानून हाथ में लेकर घूमें और कच्ची उम्र के किशोरों, नौजवानों से दुव्र्यवहार करें, यह मुख्यमंत्री और कानून, दोनों के सम्मान के लिए अच्छी बात नहीं। वैलेंटाइन्स डे के विरोधियों का कहना है कि यह पश्चिमी सभ्यता है। प्रेम पूर्वी या पश्चिमी नहीं होता। उसका इजहार भी पूर्वी या पश्चिमी नहीं होता। उसकी कोई भाषा नहीं होती। प्रेमी आंखों में बात कर लेते हैं। इसे कोई रोक नहीं सकता। विरोध करने वालों को किसी से प्रेम हो जाएगा तो वे खुद को रोक नहीं सकेंगे। शायद उन्हें बचपन से नफरत सिखाई गई है। या सिर्फ खुद से प्रेम करना सिखाया गया है। पश्चिम के बारे में हमारे यहां बहुत से लोगों के दिल में गलत धारणा है। गांधी पर सबसे मशहूर फिल्म पश्चिम के आदमी ने बनाई। हमारा पहनावा, हमारे घरों की डिजाइन, हमारी गाडिय़ां, हमारे मोबाइल, सब कुछ तो पश्चिमी है। सिगरेट और शराब भी विदेशी है। क्या विरोध करने वाले धोती पहनकर देसी और बीड़ी पीते हैं? विरोध करने वालों को घटिया सड़कें नहीं दिखतीं। नाले में बदल चुकी नदियां नहीं दिखतीं। कारखानों की वजह से बरबाद होती फसलें नहीं दिखतीं। बच्चों के भोजन में कीड़े नहीं दिखते। जनता के पैसे की जहां-तहां बरबादी नहीं दिखती। उनकी मर्दानगी उन बच्चों के सामने दिखती है जो विरोध नहीं कर सकते। सड़क और चावल के घोटाले करने वालों का विरोध करना इनके बस की बात नहीं। विरोध होता भी है तो बीच में खत्म भी हो जाता है। प्रेम के इजहार के आधुनिक तौर तरीके बदलते समय के हिस्से पुर्जे हैं। हर आदमी की अलग अलग रुचियां होती हैं। चलन के खिलाफ जाने का अपना दुस्साहस होता है। इस हिसाब से वह नया कुछ करता रहता है। नई पीढ़ी ऐसा बहुत कुछ नया अपना रही है। उसे भेड़ बकरी समझकर रोकना ठीक नहीं। उसके आगे सम्मान से अपनी बात रखनी चाहिए। समझाने की यह प्रक्रिया अपने घर से शुरू होनी चाहिए। आप महादेव घाट पर पुन्नी मेले में चल जाइए। गांव के ज्यादातर बच्चे मडोना और माइकल जैक्सन जैसे कपड़ों में मिलेंगे। आज गांव गांव में अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खुल गए हैंं। लोग शान से अपने बच्चों को उसमें भेजते हैं और उन्हें टाई पहने देखकर गौरवान्वित होते हैं। वैलेंटाइन्स डे के विरोधी इन्हें रोक पाएंगे? वे किस किस को रोकेंगे? जिन लोगों को अपनी संस्कृति की चिंता है उन्हें देखना चाहिए कि अपने प्रदेश में संस्कृति का क्या हाल है? किन लोगों का किस बात के पुरस्कार मिल रहे हैं? जिंदा आदिवासियों के प्रदेश मेंं आदिवासी मूर्ति बनाकर सजाने का सामान हो गया है। संस्कृति तो बस्तर में खत्म हो रही है भाई साहब। आप डंडे लेकर राजधानी में घूम रहे हैं।

Monday, February 16, 2009

आइसिंग कैसे करूँ?

संपादक ने आज मुझसे कहा-आपका कम आइसिंग करने का है। पेज में वैल्यू एडिशन का है। आप विज्ञप्ति चलाना बंद करिए। यह काम लड़कों से करवाइए। मुखर बनिए।
एक बार मुखर हुआ था तो कई लोगों के पेट में दर्द होने लगा था। उनकी मोनोपल्ली में सेंध लगने लगी थी। ये वे लोग है जो रायपुर से बाहर जाना नही चाहते। और किसी को आगे बढ़ते देख नही सकते। आगे बढ़ना है तो उनके किनारे से निकल जाइये। उनको नुकसान पहुचाये बगैर। उनकी दुकान के आगे ठेला लगाने की कोशिश करेंगे तो उन्हें बुरा लगेगा।
आज व्यापारियों ने प्रदर्शन किया। पुलिस ने लाठीचार्ज किया। ढेर सारी तस्वीरों के साथ ख़बर छपी। एक वरिष्ठ सहयोगी आख़िर तक बैठा था। मुझे शाम से ही मालूम था की आज उसका दिल किस तस्वीर पर अटका है। अंत में वाही हुआ। उसने पेज कुछ लेट करवाकर वह तस्वीर प्रमुखता से लगवाई जिसमे उसका दोस्त नजर आ रहा है। फोटोग्राफर ने जानबूझकर वह तस्वीर खींची है यह भी मैं अनुमान लगा सकता हूँ।
पत्रकारिता में न्यूज सोर्स को खुश रखने की जरुरत से मैं वाकिफ हूँ। ये लोग लंबे समय से अपने न्यूज सोर्स को खुश करते आ रहे है। इन लोगो ने दूसरो के न्यूज सोर्स के लिए कभी ऐसी ललक नही दिखाई. मुझसे दूसरो के खाने के लिए आमलेट बनाने कहा जा रहा है। और कहा जा रहा है कि अच्छा बनना चाहिए। मेरी दिक्कत यह है कि मुझे भी भूख लगी है और मैं आमलेट नही खाता.

Thursday, February 12, 2009

राजिम मेला

कोई अपने पड़ोसी का बच्चा चुरा कर उसे अपना साबित कर दे तो पड़ोसी को कैसा लगेगा? राजिम मेले को लेकर मुझे ऐसा ही एहसास होता है।
राजिम की राह में बड़े बड़े पोस्टर लगे हैं जिनमे कुछ लोगों की बड़ी बड़ी तस्वीरें हैं। ये पोस्टर ऐसा कुछ प्रचारित कर रहे हैं कि इन लोगों ने राजिम मेले का आयोजन किया है।
राजिम में मेला बरसों से लग रहा है। शायद सदियों से। उसे उसमे आने वाले लोग मेला बनाते हैं। ये लोग कभी अपने पोस्टर नही लगाते।
राजिम मेला इसलिए सदियों से चल रहा है क्योकि उसे लोगों की आस्था चलाती है। उस ईश्वर पर आस्था जिसका कोई राजनीतिक उद्देश्य नही है। जिसकी ईमानदारी पर किसी को शक नही है।
राजिम की राह में लगे पोस्टर देखकर मुझे ताजमहल और उस पर लिखी साहिर लुधियानवी की नज़्म याद आती है। इसमे कहा गया था कि दुनिया में अनगिनत लोगों ने प्यार किया है लेकिन उनके पास ताजमहल बनने का पैसा नहीं था। शाहजहा ने ताजमहल बनवाकर गरीबो की मोहब्बत का मजाक उडाया है।
राजिम के पोस्टर छत्तीसगढ़ की धर्मप्रेमी जनता का मजाक नही तो क्या है? यह दूसरे के बच्चे को अपना बताने की कोशिश नही तो क्या है? यह उँगली कटा कर शहीद बनना है। यह याद रखना चाहिए कि सरकारी पोस्टर जनता के पैसे से लग रहे है।

क्या यह पर्यटन विकास है?
नही
यह ख़ुद का प्रचार है। यह जनता के पैसे का दुरुपयोग है।
१२ फरवरी 2009

Thursday, February 5, 2009

जगन्नाथ की नगरी से लौटकर

कुछ रोज पहले भगवान जगन्नाथ की नगरी से लौटा हूँ। पहली बार इतनी देर तक समुद्र में नहाया। बीच की रेत पर धूप में सोया भी। अपने भाई के साथ दो तीन दिन घूमने का भी मौका मिला। पत्नी भी साथ थी। बहू भी और भतीजा भी। माँ भी आने वाली थी। उसे डॉक्टर के पास जाना था, इसलिए नही जा सकी। वैसे उसे हम पूरी यात्रा के दौरान याद करते रहे। एक तो यात्रा का कार्यक्रम ही उसके लिए बना था। फिर उडीसा उसकी जन्मभूमि है। हम उडीसा में अपनी ननिहाल जैसी निश्चिन्तता से घूमे।
ऐतिहासिक इमारतो ने मुझे कभी आकर्षित नही किया। इतिहास को हम स्कूलों में तब पढ़ते है जब इतिहास को जानने की जरूरत नही होती। बाद में जब दुनिया बड़ी होती है और अपनी पहचान खोने लगती है, अपने संस्कार अकेले पड़ने लगते है तो घर के बुजुर्गो की तरह हमारा इतिहास हमारे साथ आकर खड़ा हो जाता है और हमें संबल देता है। भौतिक तरक्की के बीच हीन भावना के शिकार मेरे मन को अशोक द्वारा लिखवाए गए संदेशो ने ताकत दी। मुझे यह सोच कर रोमांच हुआ कि ईसा मसीह के इस दुनिया में आने से पहले मेरे ननिहाल में एक राजा ने हथियार छोड़ दिए थे। वह लडाई से उकता गया था। और दुनिया उसे महान कहकर याद करती है। मेरे भाई ने मुझे वो जगह दिखाई जहाँ कलिंग का युद्घ लड़ा गया था। मुझे बस्तर की याद आई। वहां बहुत खून बह चूका है। पता नहीं अशोक हथियार कब डालेंगे।