Sunday, January 17, 2010

हमने क्या दिया?

गणतंत्र दिवस के मौके पर हम अक्सर अपने गणतंत्र के बारे में सोच विचार करते हैं। हम अक्सर यह सोचते हैं कि इतने बरस बाद हमने अपनी गणतांत्रिक व्यवस्था से क्या पाया? और यह सोचते हुए हम अक्सर निराशा या फिर नाराजगी से भर जाते हैं।
हमारे आसपास निराश और नाराज करने की बहुत सी वजहें मौजूद हैं। लेकिन यह देखना होगा कि हमारी निराशा से क्या कोई समाधान निकलता है? हमारी नाराजगी क्या हमारी दुनिया को रहने के लिए एक बेहतर जगह बनाने में काम आ रही है?
अपने गणतंत्र से हमारी निराशा या नाराजगी अक्सर किसी काम की नहीं होती। उससे किसी का भला नहीं होता। खुद अपने को भी इससे कोई फायदा नहीं मिलता। अक्सर हम व्यवस्था में सुधार तो करना चाहते हैं लेकिन चाहते हैं कि सुधार का काम नगर निगम करे, पुलिस करे, राजनीतिक दल करें, सामाजिक संगठन करें। लेकिन बहुत से सुधार हैं जो हम खुद भी कर सकते हैं। अपने घर से इसकी शुरुआत कर सकते हैं। तेज आवाज में रेडियो न बजाएं। कचरा सड़क पर न फेंकें। कुछ पेड़ -पौधे लगाकर रखें। ेएक तर्क यह दिया जाता है कि हम ही क्यों करें? दूसरे लोग तो कुछ नहीं कर रहे। यह सिर्फ नीयत का सवाल है। अगर आप कुछ करना चाहें तो आपको अपने जैसे लोग मिलते जाएंगे। अगर आप मंदिर जा रहे हों तो आपको रास्ते में कुछ लोग मिल जाएंगे जो मंदिर जा रहे होंगे। अगर आप शराब खरीदने जा रहे हैं तो रास्ते में आपको दो चार लोग मिल ही जाएंगे जो शराब खरीदने जा रहे हों। एक तर्क अक्सर दिया जाता है कि इतनी बड़ी व्यवस्था को हम अकेले कैसे सुधार पाएंगे। व्यवस्था को सुधारने के लिए पहले खुद को सुधारना पड़ता है। जिस दिन हम खुद को बदलने लगेंगे हमारी यह धारणा बदल जाएगी कि देश के लिए एक भी आदमी नहीं सोचता। आपको पता होगा कि कम से कम एक आदमी तो सोचता है। और वो आप हैं।
गणतंत्र का अर्थ है जनता का शासन। जनता अपने काम करने के लिए प्रतिनिधि चुनती है। वे जनता के बीच से चुने जाते हैं। जनता के लिए काम करते हैं। हमने लंबे समय तक राजतंत्र को जिया है। सामंती व्यवस्था में जीते आए हैं। इसलिए हम अपने प्रतिनिधियों को राजा-महाराजाओं का दर्जा दे देते हैं। जब वे हमारा पैसा महंगी गाडिय़ों, अनावश्यक दौरों और अपने लाव लश्कर की जरूरतों पर खर्च करते हैं तो हम उनका विरोध नहीं करते, उन्हें फूलों के हार पहनाते हैं। हम भूल जाते हैं कि यह हमारी सरकार है, यह व्यक्ति हमारा काम करने के लिए चुना गया है, यह जो अपव्यय कर रहा है यह हमारा ही पैसा है। जिस दिन हम यह सोचने लग जाएंगे, हमारे गणतंत्र को मजबूती मिलने लगेगी।
हम ऐसी विसंगतियां अपने आसपास रोज देखते हैं, लेकिन उनमें सुधार के लिए कोई योगदान नहीं देते। अपने घर के आसपास कूड़ा हम ही फैलाते हैं और शहर की गंदगी के लिए म्यूनिसिपल को कोसते हैं। हम तेज आवाज में रेडियो और टीवी चलाते हैं और ध्वनि प्रदूषण पर चिंता करते हैं। हम अपनी बारात अधिक से अधिक सड़क घेर कर निकालना चाहते हैं और दूसरों की बारात निकलती है तो हमें बुरा लगता है। हमारे घर के नाबालिग बच्चे जानलेवा रफ्तार से गाडिय़ां चलाते हैं और जब ट्रैफिक पुलिस उन्हें पकड़ती है तो उन्हें छुड़वाने के लिए अपनी पहुंच का इस्तेमाल करते हैं। हम अपनी दूकान का सामान सड़क पर फैला देते हैं। हम कचहरी के क्लर्क को रिश्वत देकर अपना काम निकलवा लेते हैं और व्यवस्था को गालियां देते हुए वहां से निकलते हैं। हमारे कारखाने धुआं उगलते हैं और हम सरकारी अफसरों से सांठ गांठ कर ईएसपी बंद रखते हैं। हममें से ही कुछ लोग इसके खिलाफ आंदोलन करते हैं और फिर कुछ दिनों बाद रहस्यमय ढंग से खामोश हो जाते हैं।
हमारे आसपास झुग्गी बस्तियों में सैकड़ों बच्चे अशिक्षा के अंधकार में पूरा जीवन गुजार देते हैं। हम अपने ज्ञान का थोड़ा सा उजाला उन्हें देना नहीं चाहते। हम बाजार के कहने में आकर खुद को सजाने के लिए महंगे जूते कपड़े पहनते हैं और कामवालियों से, सब्जीवालियों से, रिक्शेवालों से दो रुपए के लिए मोलभाव करते हैं। सड़क पर ठेले वाले ब्लू फिल्मों की सीडी हमें ही बेचते हैं, हम ही जिस्म के बाजार को पालते हैं ।
और इसके बाद हम सवाल करते हैं कि लोकतंत्र ने हमें क्या दिया। हमें सवाल करना चाहिए कि हमने लोकतंत्र को क्या दिया। कितना समय इसे मजबूत करने में लगाया? इसके लिए कितना खून बहाया? कितने बच्चों को पढ़ाया? कितने लोगों को रोजगार से लगाया? कितने लोगों को बीमारी से बचाया?
हमारी लड़ाई के दो जरूरी मोर्चे हैं। एक तो बाहर की विसंगतियों से लड़ाई और दूसरे खुद के स्वार्थ, आलस्य और भय से। गणतंत्र दिवस के मौके पर बस इतना ही सोच लें और गर्व से कहें- जय हिंद।

(एक पत्रिका के लिए लिखा गया संपादकीय)

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