छत्तीसगढ़ में नगरीय निकायों के चुनाव हो रहे हैं। यह लोकतंत्र का सबसे बड़ा त्योहार है। जनता अपनी जरूरतों का ध्यान रखने के लिए अपने प्रतिनिधि चुनती है। उन्हें जनता के लिए काम करना होता है। यह अलग बात है कि चुने जाने के बाद बहुत से लोग जनता के काम पर कम, अपने काम पर ज्यादा ध्यान देने लगते हैं। गरीब नेता पद पाकर अमीर होने लगते हैं। कुछ तो सात पीढिय़ों के लायक धन इकट्ठा कर लेते हैं। इसीलिए राजनीति और नेताओं को लेकर लोगों के मन में अच्छी धारणा नहीं है। लेकिन यह सब जनता में लोकतंत्र की समझ और संस्कार के अभाव का नतीजा है। जनता का एक बड़ा वर्ग अपनी जिम्मेदारियां निभाने के लिए तैयार नहीं है। या उसके पास इसके लिए वक्त नहीं है। ताकत नहीं है। जनता की यह कमजोरी, यह मजबूरी जितनी जल्दी दूर होगी, लोकतंत्र उतनी ही जल्दी बेहतर नतीजे देगा। लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन है। जनता को अपने शासन की जिम्मेदारी समझनी होगी। उसे राजा-प्रजा के जमाने के संस्कारों से खुद को बाहर निकालना होगा और जो लोग खुद को राजा समझते हैं उन्हें यह अहसास दिलाते चलना होगा कि भाई साहब-बहनजी आप लोग हमारे बीच के ही हो। अभी हो यह रहा है कि देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू है पर शासक और शासित के दो वर्ग बने हुए हैं। एक तरफ नेता-मंत्री, अफसर, बड़े धनपति, बाहुबली किस्म के लोग हैं दूसरी तरफ आम लोग। शासक वर्ग जनता से दूर रहता है और क्रमश: दूर होता चला जाता है। दूर का मतलब यह कि गरीब जनता गरीब रह जाती है और शासक वर्ग के लोगों का धन बढ़ता जाता है। आमतौर पर जो शासक वर्ग है वह नहीं चाहता कि जनता जागरूक और जिम्मेदार बने। वह नहीं चाहता कि उसका काम काज सूचना के अधिकार के जरिए पारदर्शी हो जाए। वह शासक बने रहना चाहता है। दरअसल कमजोर जनता ने इन्हें शासक बना रखा है। ये शासक नहीं हैं। इन्हें प्रबंधक कहा जाना चाहिए। शासन तो जनता का है। जनता को यह बात महसूस करनी होगी। और खुद पर जिम्मेदारी लेनी होगी। इसके लिए जनता को पहले खुद को शिक्षित बनाना होगा। संघर्ष की क्षमता अपने में विकसित करनी होगी। बहुत से लोग यह काम कर रहे हैं। वे शासक वर्ग को यह अहसास दिलाने में लगे हैं कि भाई साहब आप हमसे अलग नहीं हो। ऐसे ही प्रयासों के चलते भ्रष्ट नेता जेल जाते हैं और प्रभावशाली पदों पर काम करने वालों का काम, उनकी संपत्ति सूचना के अधिकार के दायरे में आती है। संघर्ष करने वालों के कारण ही जनता को बहुत से अधिकार मिलते चले जाते हैं। लेकिन यह काम कुछ लोगों के भरोसे छोडऩा ठीक नहीं। हर नागरिक को जिम्मेदार और सक्षम बनना होगा। तभी असमानता और अन्याय दूर होगा। राजनीति के नाम पर नाक भांै सिकोडऩे वालों कों राजनीति में खुद भी आना चाहिए। देखना चाहिए कि बुरे माने जाने वाले लोग क्यों सफल हैं। देखना चाहिए कि वे खुद कैसे सफल हो सकते हैं। ताकत तो ताकत होती है। वह चाहे भले आदमी के पास हो चाहे बुरे आदमी के पास, उसके दम पर काम किए जा सकते हैं। तो जनता को ताकत जुटानी होगी। हमें आंखें खोलकर सफल नेताओं के दुर्गुणों के बीच, उनके गुणों को देखना चाहिए। बहुतेरे नेता हैं जो सुबह जल्दी उठते हैं, कसरत करते हैं, संयमित भोजन करते हैं, अध्ययन करते हैं, दिन भर और शायद देर रात तक काम करते हैं, वे अपने परिवार को समय कम दे पाते हैं, अपने निजी शौक के लिए उनके पास समय नहीं रहता, जीवन जनता के काम के लिए समर्पित हो जाता है। बहुत से नेताओं को राजनीति के उतार चढ़ाव देखने पड़ते हैं, खतरे उठाने पड़ते हैं। नेताओं की बुराई करने से पहले यह देखना चाहिए कि हममें क्या उनके जैसी अच्छी आदतें हैं? हम उनके जितना त्याग कर रहे हैं? खुद को ताकतवर बनाने के लिए क्या उतना समय, उतना श्रम लगा रहे हैं? हममें से ज्यादातर लोग राजनीति के समुद्र के किनारे बैठकर लहरें गिनते हैं। उन्हें समुद्र में उतरना चाहिए। साहसिक यात्राओं पर निकलना चाहिए। गोते लगाकर मोती ढूंढने चाहिए। और दूसरों के लिए मिसाल बनना चाहिए कि भइया मोती इस तरह मिलते हैं। तूफानों का सामना इस तरह किया जाता है। इस तरह जिया जाता है। किसी शायर ने कहा है-
मोहब्बत को समझना है
तो खुद नासेह मोहब्बत कर
किनारे से कभी
अंदाजा ए तूफां नहीं होता
Sunday, December 20, 2009
Thursday, December 17, 2009
मेरी बेटी, मेरा फख्र
(एक पत्रिका के लिए अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी सबा अंजुम की मां फरीदा बेगम से एक मुलाकात मौका लगा था। उनकी कहानी, उन्हीं की जुबानी)
चौथी पढ़ती थी सबा। हमेशा बोलती थी- मैं भी हॉकी खेलने जाऊंगी। तनवीर सर के पास नाम लिखाऊंगी। मोहल्ले के सारे बच्चे खेलने कूदने वाले थे। उनमें से कुछ हॉकी खेलने मैदान भी जाते थे। सबा के भाई भी जाते थे। वह उनके साथ मैदान चली जाती थी। उछल कूद करती रहती थी। लड़कियों के साथ नहीं खेलती थी। लड़कों के साथ खेलती थी। कंचे खेलना उसका शौक था। पतंग भी वह उड़ाती थी और कटी हुई पतंगें लूटती भी थी। हमारे घर में बच्चों को स्कूल न जाने के लिए कभी डांट नहीं पड़ी। खेलने न जाओ तो जरूर डांट पड़ती थी। ऐसे में सबा एक रोज स्कूल से देर से आई। मैंने पूछा तो उसने बताया- तनवीर सर के पास नाम लिखवाने गई थी। तनवीर सर हमारे घर के पास ही रहते हैं। वे बच्चों को सिखाते थे। सबा ने उनकी देखरेख में हॉकी खेलना शुरू किया। मैं तो समझती नहीं खेल के बारे में। सबा बताती है कि खेल में वह आज जो कुछ है, तनवीर सर की बदौलत है। तनवीर सर भी उसे बेटी जैसा प्यार करते हैं। एक कोच के लिए सारे खिलाड़ी बराबर होते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि उन्होंने मेरी बेटी पर ज्यादा ध्यान दिया। शायद उन्हें लगा हो कि यह लड़की आगे तक जा सकती है। हमारे लिए वे दिन बहुत गरीबी के थे। बच्चों के अब्बा मस्जिद में मुअज्जन थे। आठ सौ रुपया महीना पगार मिलती थी। घर के खर्चे चलाने के लिए मैं छोटे छोटे काम करती थी। नगर निगम में किसी का काम है तो मैं कुछ पैसे लेकर वह काम करवा आती थी। किसी के लिए कथरी सी देती थी। घर में पिपरमेंट-बिस्कुट की दुकान इनके अब्बा ने खोली थी। मैंने खुद बारह साल अंडे बेचे हैं। मगर इस मुफलिसी का अहसास हमने कभी अपने बच्चों को होने नहीं दिया। मैं उनसे कहती थी- तुम्हें क्या चाहिए बोलो। इसकी फिक्र मत करो कि अम्मी कहां से लाएगी। मेरे बच्चों को मुझ पर भरोसा भी बहुत था। इसी दौरान सबा को विदेश जाने का पहला मौका लगा। उसे हांगकांग जाना था। पासपोर्ट के लिए दो हजार रुपयों की जरूरत थी। वह बंैगलोर में थी। उसने मुझे खबर भेजी। और अपनी सहेलियों को बता दिया- मेरी अम्मी रुपयों का इंतजाम कर लेगी। मैंने घर के लिए राशन खरीद कर रखा था। उसे मोहल्ले में बेच दिया। अंडे बेच कर 4 हजार के बर्तन खरीदे थे, वे मैंने 17 सौ में बेच दिए। बड़ी बेटी को विदा करते वक्त इतना नहीं रोई होऊंगी जितना ये बर्तन बेचकर रोई। मोहल्ले वाले समझाते थे- सबा जीत कर लौटेगी, फिर बर्तनों की दुकान खोल लेना। बहरहाल, रुपयों का इंतजाम मैंने कर लिया। सबा को ये रुपए पहुंचाने उसका भाई भोपाल से आया और बैंगलोर तक गया। सबा की कोच को पता चला तो उसने मुझसे फोन पर कहा- आप बहुत अच्छी मम्मी हैं। सबा बहुत भरोसे से कहती थी कि मेरी मम्मी रुपयों का इंतजाम कर देंगी। गरीबी के उन दिनों में हम लोग उस खुराक का इंतजाम नहीं कर पाते थे जो एक खिलाड़ी के लिए जरूरी होती है। खेलकर आने के बाद सबा को खूब भूख लगती थी। मैं उसके लिए काली चाय बना देती थी। दूध तो नसीब नहीं था। कभी कभी शक्कर भी नहीं होती थी। सबा काली चाय के साथ रात का चावल खा लेती थी। यह खाना उसे आज भी पसंद है। आज भी कभी कभी मूड होने पर वह चाय चावल की फरमाइश करती है। सबा को लल्ला होटल की पोहा-जलेबी भी पसंद थी। यह होटल कसारीडीह में है। हमारे उन लोगों से घर जैसे संबंध हैं। घर की बुजुर्ग महिला को सबा नानी कहती थी। मुझसे दो रुपए लेती थी और होटल से एक रुपए का पोहा और एक रुपए की जलेबी ले आती थी। वही उसका नाश्ता होता था। विदेश घूमने के बाद भी वह लल्ला होटल को नहीं भूली। इंग्लैंड से खेलकर लौटी तो एक रोज उसे पोहा जलेबी की याद आई। वह सीधे होटल पहुंच गई। तब तक वह मशहूर हो चुकी थी। उसे देखने के लिए पूरा कसारीडीह इकट्ठा हो गया। नानी की आंखों से आंसू बहने लगे। उसने कहा- तुम बहुत बड़ी हो गई हो। मैंने सोचा था अब कभी हमारे होटल में नहीं आओगी।मेरी दिली तमन्ना थी कि सबा खेलने के लिए विदेश जाए। सबा ने पहली बार विदेश जाने से पहले मुझे फोन किया और कहा- अल्लाह का कितनी बार शुक्रिया अदा करूं कि उसने मेरी अम्मी की दुआ सुन ली। आज भी वह खेलने जाने से पहले मुझे फोन करती है। कहती है- तुमसे बात किए बगैर खेलने में मन नहीं लगता। खेलने के बाद भी बात करती है। कभी कभी थिएटर से फोन करती है कि फिल्म बोर है। अगर उसे पता लगा कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है तो दिन में दस बार फोन करती है। पूछती है दवा खाई कि नहीं। वह अब मुझे कहीं आने जाने नहीं देती। कहती है- बहुत हो गई भागदौड़। अब आराम करो। वह जहां जाती है, मेरे लिए कुछ न कुछ खरीद लाती है। साडिय़ां, पर्स, परफ्यूम। मंै कहती हूं- अब मेरे पहनने ओढऩे के दिन नहीं रहे। वह कहती है- जब दिन थे तब गरीबी थी। अब अल्लाह ने दिया है तो पहनना ओढऩा चाहिए। मैं कहती हूं- लोग क्या कहेंगे? वह कहती है- लोगों की परवाह मत करो। मेरे बच्चों ने दुनिया घूम ली और मैं डोंगरगढ़ के आगे नहीं जा पाई। मेरी नागपुर घूमने की बड़ी तमन्ना है। पोली कहती है कि नागपुर क्या, तुम्हें पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, बाम्बे सब घुमाऊंगी। एक बार अपने साथ कोरबा ले गई थी। लॉज में रुकवाया जहां बड़े लोग रुकते हैं। मैंने पहली बार जाना कि लॉज किसे कहते हैं। मेरे पास एक सायकल है। मैंने उसे मुफलिसी के दिनों में चलाया है। वह मुझे बेहद पसंद है। दस कारें भी उसका मुकाबला नहीं कर सकतीं। पोली कहती है कि उसे म्यूजियम में रखवा देंगे। अब घर में एक नई दोपहिया है। एक रोज पोली का फोन आया- अम्मी, गाड़ी भूलकर भी मत चलाना। उसने कहीं कोई एक्सीडेंट देख लिया था। मुझसे बोली- कहीं तुम निबट गए तो मैं अनाथ हो जाऊंगी। वह मुझसे दोस्तों जैसी बात करती है। एक रोज उसने घर में गोभी का पुलाव बनाया। मुझसे पूछा- कैसा बना है। मैंने कहा- अपने हिसाब से अच्छा बना लिया तुमने। उसने कहा- सच सच बताओ, कैसा बना है? क्या कम है? मैंने कहा- नमक कम है और मिर्च कम है। उसने पूछा- और क्या कमी है? मैंने कहा- जले हुए जैसी गंध आ रही है। वह बोली- मैंने इतनी मेहनत से बनाया तुम तारीफ भी नहीं कर सकतीं? मैंने कहा- वही तो कर रही थी, तुमने सच पूछा तो बताना पड़ा। बाद में उसने एक रोज बांबे से फोन किया था- मैंने पुलाव बनाना सीख लिया है। अब जलाती नहीं हूं। उसे चावल का चीला बहुत पसंद है। आलू का पराठा भी। मिर्च मसाले वाली चीजों की भी फरमाइश करती है जो शायद उसे खेल के दौरान नहीं मिलतीं। हम लोग पचीस साल एक ही मकान में रहे। अब हमने एक बड़ा घर खरीद लिया है। सबा की जिद थी। हमारे परिचित का मकान था। उन्होंने पूछा तो सबा ने बताया- यह मकान मेरे अब्बा की तमन्ना और अम्मी की पसंद है। इन्होंने जीवन भर मुझे मेरी पसंद की चीजें दीं। अब मैं इनकी पसंद की चीज देना चाहती हूं। वह हमें इतना चाहती है। अल्लाह ऐसी औलाद हर मां बाप को दे।
चौथी पढ़ती थी सबा। हमेशा बोलती थी- मैं भी हॉकी खेलने जाऊंगी। तनवीर सर के पास नाम लिखाऊंगी। मोहल्ले के सारे बच्चे खेलने कूदने वाले थे। उनमें से कुछ हॉकी खेलने मैदान भी जाते थे। सबा के भाई भी जाते थे। वह उनके साथ मैदान चली जाती थी। उछल कूद करती रहती थी। लड़कियों के साथ नहीं खेलती थी। लड़कों के साथ खेलती थी। कंचे खेलना उसका शौक था। पतंग भी वह उड़ाती थी और कटी हुई पतंगें लूटती भी थी। हमारे घर में बच्चों को स्कूल न जाने के लिए कभी डांट नहीं पड़ी। खेलने न जाओ तो जरूर डांट पड़ती थी। ऐसे में सबा एक रोज स्कूल से देर से आई। मैंने पूछा तो उसने बताया- तनवीर सर के पास नाम लिखवाने गई थी। तनवीर सर हमारे घर के पास ही रहते हैं। वे बच्चों को सिखाते थे। सबा ने उनकी देखरेख में हॉकी खेलना शुरू किया। मैं तो समझती नहीं खेल के बारे में। सबा बताती है कि खेल में वह आज जो कुछ है, तनवीर सर की बदौलत है। तनवीर सर भी उसे बेटी जैसा प्यार करते हैं। एक कोच के लिए सारे खिलाड़ी बराबर होते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि उन्होंने मेरी बेटी पर ज्यादा ध्यान दिया। शायद उन्हें लगा हो कि यह लड़की आगे तक जा सकती है। हमारे लिए वे दिन बहुत गरीबी के थे। बच्चों के अब्बा मस्जिद में मुअज्जन थे। आठ सौ रुपया महीना पगार मिलती थी। घर के खर्चे चलाने के लिए मैं छोटे छोटे काम करती थी। नगर निगम में किसी का काम है तो मैं कुछ पैसे लेकर वह काम करवा आती थी। किसी के लिए कथरी सी देती थी। घर में पिपरमेंट-बिस्कुट की दुकान इनके अब्बा ने खोली थी। मैंने खुद बारह साल अंडे बेचे हैं। मगर इस मुफलिसी का अहसास हमने कभी अपने बच्चों को होने नहीं दिया। मैं उनसे कहती थी- तुम्हें क्या चाहिए बोलो। इसकी फिक्र मत करो कि अम्मी कहां से लाएगी। मेरे बच्चों को मुझ पर भरोसा भी बहुत था। इसी दौरान सबा को विदेश जाने का पहला मौका लगा। उसे हांगकांग जाना था। पासपोर्ट के लिए दो हजार रुपयों की जरूरत थी। वह बंैगलोर में थी। उसने मुझे खबर भेजी। और अपनी सहेलियों को बता दिया- मेरी अम्मी रुपयों का इंतजाम कर लेगी। मैंने घर के लिए राशन खरीद कर रखा था। उसे मोहल्ले में बेच दिया। अंडे बेच कर 4 हजार के बर्तन खरीदे थे, वे मैंने 17 सौ में बेच दिए। बड़ी बेटी को विदा करते वक्त इतना नहीं रोई होऊंगी जितना ये बर्तन बेचकर रोई। मोहल्ले वाले समझाते थे- सबा जीत कर लौटेगी, फिर बर्तनों की दुकान खोल लेना। बहरहाल, रुपयों का इंतजाम मैंने कर लिया। सबा को ये रुपए पहुंचाने उसका भाई भोपाल से आया और बैंगलोर तक गया। सबा की कोच को पता चला तो उसने मुझसे फोन पर कहा- आप बहुत अच्छी मम्मी हैं। सबा बहुत भरोसे से कहती थी कि मेरी मम्मी रुपयों का इंतजाम कर देंगी। गरीबी के उन दिनों में हम लोग उस खुराक का इंतजाम नहीं कर पाते थे जो एक खिलाड़ी के लिए जरूरी होती है। खेलकर आने के बाद सबा को खूब भूख लगती थी। मैं उसके लिए काली चाय बना देती थी। दूध तो नसीब नहीं था। कभी कभी शक्कर भी नहीं होती थी। सबा काली चाय के साथ रात का चावल खा लेती थी। यह खाना उसे आज भी पसंद है। आज भी कभी कभी मूड होने पर वह चाय चावल की फरमाइश करती है। सबा को लल्ला होटल की पोहा-जलेबी भी पसंद थी। यह होटल कसारीडीह में है। हमारे उन लोगों से घर जैसे संबंध हैं। घर की बुजुर्ग महिला को सबा नानी कहती थी। मुझसे दो रुपए लेती थी और होटल से एक रुपए का पोहा और एक रुपए की जलेबी ले आती थी। वही उसका नाश्ता होता था। विदेश घूमने के बाद भी वह लल्ला होटल को नहीं भूली। इंग्लैंड से खेलकर लौटी तो एक रोज उसे पोहा जलेबी की याद आई। वह सीधे होटल पहुंच गई। तब तक वह मशहूर हो चुकी थी। उसे देखने के लिए पूरा कसारीडीह इकट्ठा हो गया। नानी की आंखों से आंसू बहने लगे। उसने कहा- तुम बहुत बड़ी हो गई हो। मैंने सोचा था अब कभी हमारे होटल में नहीं आओगी।मेरी दिली तमन्ना थी कि सबा खेलने के लिए विदेश जाए। सबा ने पहली बार विदेश जाने से पहले मुझे फोन किया और कहा- अल्लाह का कितनी बार शुक्रिया अदा करूं कि उसने मेरी अम्मी की दुआ सुन ली। आज भी वह खेलने जाने से पहले मुझे फोन करती है। कहती है- तुमसे बात किए बगैर खेलने में मन नहीं लगता। खेलने के बाद भी बात करती है। कभी कभी थिएटर से फोन करती है कि फिल्म बोर है। अगर उसे पता लगा कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है तो दिन में दस बार फोन करती है। पूछती है दवा खाई कि नहीं। वह अब मुझे कहीं आने जाने नहीं देती। कहती है- बहुत हो गई भागदौड़। अब आराम करो। वह जहां जाती है, मेरे लिए कुछ न कुछ खरीद लाती है। साडिय़ां, पर्स, परफ्यूम। मंै कहती हूं- अब मेरे पहनने ओढऩे के दिन नहीं रहे। वह कहती है- जब दिन थे तब गरीबी थी। अब अल्लाह ने दिया है तो पहनना ओढऩा चाहिए। मैं कहती हूं- लोग क्या कहेंगे? वह कहती है- लोगों की परवाह मत करो। मेरे बच्चों ने दुनिया घूम ली और मैं डोंगरगढ़ के आगे नहीं जा पाई। मेरी नागपुर घूमने की बड़ी तमन्ना है। पोली कहती है कि नागपुर क्या, तुम्हें पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, बाम्बे सब घुमाऊंगी। एक बार अपने साथ कोरबा ले गई थी। लॉज में रुकवाया जहां बड़े लोग रुकते हैं। मैंने पहली बार जाना कि लॉज किसे कहते हैं। मेरे पास एक सायकल है। मैंने उसे मुफलिसी के दिनों में चलाया है। वह मुझे बेहद पसंद है। दस कारें भी उसका मुकाबला नहीं कर सकतीं। पोली कहती है कि उसे म्यूजियम में रखवा देंगे। अब घर में एक नई दोपहिया है। एक रोज पोली का फोन आया- अम्मी, गाड़ी भूलकर भी मत चलाना। उसने कहीं कोई एक्सीडेंट देख लिया था। मुझसे बोली- कहीं तुम निबट गए तो मैं अनाथ हो जाऊंगी। वह मुझसे दोस्तों जैसी बात करती है। एक रोज उसने घर में गोभी का पुलाव बनाया। मुझसे पूछा- कैसा बना है। मैंने कहा- अपने हिसाब से अच्छा बना लिया तुमने। उसने कहा- सच सच बताओ, कैसा बना है? क्या कम है? मैंने कहा- नमक कम है और मिर्च कम है। उसने पूछा- और क्या कमी है? मैंने कहा- जले हुए जैसी गंध आ रही है। वह बोली- मैंने इतनी मेहनत से बनाया तुम तारीफ भी नहीं कर सकतीं? मैंने कहा- वही तो कर रही थी, तुमने सच पूछा तो बताना पड़ा। बाद में उसने एक रोज बांबे से फोन किया था- मैंने पुलाव बनाना सीख लिया है। अब जलाती नहीं हूं। उसे चावल का चीला बहुत पसंद है। आलू का पराठा भी। मिर्च मसाले वाली चीजों की भी फरमाइश करती है जो शायद उसे खेल के दौरान नहीं मिलतीं। हम लोग पचीस साल एक ही मकान में रहे। अब हमने एक बड़ा घर खरीद लिया है। सबा की जिद थी। हमारे परिचित का मकान था। उन्होंने पूछा तो सबा ने बताया- यह मकान मेरे अब्बा की तमन्ना और अम्मी की पसंद है। इन्होंने जीवन भर मुझे मेरी पसंद की चीजें दीं। अब मैं इनकी पसंद की चीज देना चाहती हूं। वह हमें इतना चाहती है। अल्लाह ऐसी औलाद हर मां बाप को दे।
निर्मल वर्मा को पढ़ते हुए
निर्मल वर्मा का उपन्यास एक चिथड़ा सुख बहुत पहले पढ़ा था। एक बिलकुल नई दुनिया को इसके जरिए देखने का मौका लगा। एक कस्बाई मध्यमवर्गीय व्यक्ति के लिए यह दुनिया अपने से बेहतर सोचने समझने वालों और अपने से अधिक स्पष्टï चरित्र वाले लोगों की थी। कलाकारों के जीवन के बारे में पहले बहुत किस्से कहानियां सुन चुका था लेकिन इस उपन्यास के पात्र मिलकर एक अलग ही दुनिया रचते हैं। ऐसे लोगों के दुनिया में होने की कल्पना ही मुझे अपने आप में बहुत अच्छी लगी और अनोखी बात यह लगी कि ये लोग हू ब हू किताब के भीतर भी मौजूद थे। यह ईश्वर और साहित्यकार के रचना संसार का साथ साथ अहसास करते चलना था। मुझे इस उपन्यास के पात्र बिट्टी और उसका कजिन बहुत पसंद आए। अक्सर मुन्नू मुझे अपने जैसा लगता रहा। इस उपन्यास को पढऩा उसकी बगल में दुबके हुए इस अनोखी दुनिया को देखने जैसा था। मैं बिट्टी जैसे कई लोगों को जानता हूं इसलिए उसने चित्रण ने भी मुझे बहुत प्रभावित किया। मेेरे लिए बिट्टïी अपने आप में एक बहुत महान पात्र है और मैं अक्सर सोचता हूं कि इन पात्रों की तकदीर से खेलने वाला लेखक कैसा होगा? इस उपन्यास के जरिए मैंने बिट्टी और मुन्नू के घर को अंदर से देखा। मुझे बहुत अच्छा लगा यह जानकर कि हमारे जैसे दूसरे लोग दिल्ली में भी हैं जो फर्श पर सो लेते हैं। कपड़े खुद धोते हैं। रात बिरात घर आते हैं। देर तक सोते हैं। दूसरे को जगाने के लिए कह देते हैं। जगाने से जागते नहीं और जिन्हें उठाने के लिए उनके कहे का वास्ता देना पड़ता है। जो लोग एक साथ खा नहीं पाते और पर्चियां छोड़ जाते हैं कि खाना बना दिया है, खा लेना। हमारे घर में यही काम बगैर पर्चियों के होता था। बिट्टी और उसके दोस्तों की दुनिया में मैंने पहली बार शराब पीने वालों को इतने करीब से देखा। उनके बीच बैठकर नहीं लगता कि ये लोग कोई अपराध कर रहे हैं। ध्यान इस पर बना रहता है कि ये लोग क्या सोच रहे हैं। ऐसे पात्र हर कहानी के नहीं हो सकते।
सुब्रत बसु को याद करते हुए
रायपुर के पुराने रंगकर्मी सुब्रत बोस से एक बार मिलना हुआ था। वे मर्डर जैसी चर्चित फिल्मों के निर्देशक अनुराग बसु के पिता हैं। उनका पूरा परिवार एक्टिंग से लेकर फिल्म बनाने तक के कामों में जुटा हुआ है। अनुराग आज मुंबई के सबसे व्यस्त निर्देशकों में से हैं। बड़े बड़े फिल्मकार उनसे अपनी फिल्में बनवाना चाहते हैं। सुब्रत से चर्चा के दौरान मुझे अपनी बरसों पुरानी एक धारणा के बारे में नए सिरे से सोचने की जरूरत महसूस हुई। हमने उनसे सवाल किया था कि छत्तीसगढ़ी लोककला बहुत ज्यादा सामने नहीं आ पाई है। इसकी क्या वजह है और इसे सामने लाने के लिए क्या किया जाना चाहिए? हमने यह भी पूछा था कि क्या नाचा को अधिक महत्व देकर ऐसा किया जा सकता है? जवाब में सुब्रत ने कहा कि जो लोग छत्तीसगढ़ की संस्कृति को सामने ला सकते थे उन्होंने सबसे बड़ा नुकसान किया। उन्होंने छत्तीसगढ़ी संस्कृति के नाम पर अपने को प्रोजेक्ट किया। यहां के कवियों ने, संगीतकारों ने यही किया। सुब्रत किसी से दुश्मनी नहीं मोल लेना चाहते थे लेकिन फिर उन्होंने दिल की बात कह ही डाली कि दाऊ रामचंद्र देशमुख के चंदैनी गोंदा समेत, छत्तीसगढ़ी के सांस्कृतिक मंचों में जो गीत संगीत पेश किया जाता था, उस पर गीत-संगीतकारों के अपने अपने दावे होते थे कि ये मोर गीत हे, ये मोर संगीत हे। इसे आप कैसे लोकसंगीत कहेंगे? असली लोकसंगीत को तो उसके पवित्र रूप में कभी आगे ही नहीं आने दिया गया। दाऊ रामचंद्र देशमुख के घर मैं बचपन में एक-दो बार गया हूं। वे वैद्य भी थे और पिताजी को उनसे कंधे की तकलीफ की दवा लेनी थी। उनके घर पर नाच-गाना होते भी मैंने देखा। उनका चंदैनी गोंदा मैंने अपनी आंखों से कभी नहीं देखा, सिर्फ उसकी रिकार्डिंग सुनी। और उसके बारे में उससे जुड़े लोगों ं के संस्मरण मैं लगातार सुनता रहा। और इनके आधार पर मेरी देशमुखजी के बारे में जो धारणा बनी उसमें सम्मान ही सम्मान था। और वह अपनी तरह का एक गरिमामय, अधिक प्रामाणिक छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक मंच था यह धारणा मेरी अभी भी है। लेकिन मोर गीत, मोर संगीत वाली बात मुझे जमी है। तब शायद लोक गीत-संगीत का तत्व भी इतना रहा होगा, इससे जुड़े लोग इतने गंभीर रहे होंगे कि तोर-मोर वाली बात को उतना महत्व नहीं मिला होगा। आज यह बात अधिक स्पष्टï होकर दिखती है। और इस तोर मोर में मुंबई से आयातित मसाला मिला कर तल-भूनकर बाजार में पेश किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक परिदृश्य के इस हिस्से को देखें तो वह शराबखाने के बाहर लगी अंडा दूकान जैसा लगता है।
दिल की बात
मेरा एक दो रोज पहले रायपुर के सप्रे स्कूल मैदान पर जाना हुआ। खेल के मैदान पर समय गुजार कर मैं दफ्तर के काम की थकान उतार लेना चाहता था। मेरी किसी से जान पहचान नहीं थी। सो देखने के अलावा कोई चारा नहीं था। स्कूली लड़कों के, लड़कियों के दल अलग अलग फुटबॉल का अभ्यास कर रहे थे। मैं किसी जमाने में फुटबॉल का शौकीन रहा हूं। और मोहल्ले में खेलता रहा हूं। मुझे देखकर दुख हुआ कि मिडिल स्कूल की पांच छह बच्चियां बगैर किसी मार्गदर्शन के फुटबॉल का अभ्यास कर रही थीं। मैं एक दिन के अनुभव के आधार पर कुछ नहीं कहना चाहता। बच्चियों को खेल की कुछ तकनीकी जानकारियों से वाकिफ देखकर लगा कि इन्हें सिखाया तो जरूर गया है। लेकिन बगैर कोच या किसी जानकार की मौजूदगी के, उनके अभ्यास को देखकर मुझे लगा कि उनकी ताकत व्यर्थ अधिक हो रही है। वे सीख कम रही हैं। मैं नहीं जानता कि इन लड़कियों को सिखाने के लिए कोई कोच होता तो वह भी वे बारीकियां इन बच्चियों को सिखाता कि नहीं जिनके बारे में मैं सोच रहा था। मैंने बहुत मौकों पर शहर में बच्चों को, और बड़ों को भी फुटबॉल खेलते देखा है। मैच खेलते भी देखा है और अभ्यास करते भी देखा है। मुझे फुटबॉल का असली आनंद कभी नहीं आया। मुझे लगता है कि ज्यादातर लोग फुटबॉल के आनंद को जानते ही नहीं। और फुटबॉल खेलने के बारे में उनके पास कोई मौलिक विचार नहीं है। फुटबॉल खेलते बच्चों में मुझे सबसे बड़ी कमजोरी नजर आई, जो बड़ों में भी उतनी ही नजर आई, कि फुटबॉल उनके लिए खेल न होकर युद्ध हो जाता है या फिर भगदड़। किसी को देखकर यह नहीं लगता कि उसे फुटबॉल खेलने में मजा आ रहा हो और वह फुटबॉल पर इतना अधिकार रखता हो कि दूसरों को नचा कर खुद का भी और दर्शकों का भी मनोरंजन कर सके। फुटबॉल के साथ जो आनंद न मना सके, वह फुटबॉल क्या खेलेगा? फुटबॉल खेलने वालों में मुझे दूसरी सबसे बड़ी कमजोरी यह नजर आई कि कोई अपनी लय से खेलता नजर नहीं आता। कोई टीम एक लय से खेलते नजर नहीं आती। और कुल मिलाकर खेल की कोई लय नहीं बन पाती। खिलाड़ी बदहवास होकर गेंद के पीछे भागते हैं और गेंद कभी उनके नियंत्रण में नहीं रहती। वे लड़ते ऐसे हैं जैसे पशु लड़ते हैं और गेंद अक्सर साइड लाइन या गोल लाइन के बाहर जाती रहती है। पास, ड्रिबल, डॉज और मूव के साथ खेलते मुझे शायद ही कोई टीम दिखी। हालांकि मैं दावा नहीं करता कि रायपुर में खेलने वाली सारी टीमों का खेल मैंने देख लिया है। लेकिन बीस पचीस टीमों का खेल तो देखा ही होगा। मुझे लगता है कि अपनी क्षमता के हिसाब से अपने को विकसित करना कोई कोच किसी खिलाड़ी को नहीं सिखाता। जैसे कम बुद्धि महिलाएं पड़ोसन को देखकर अपना जीवन तय करती हैं वैसे ही ज्यादातर फुटबॉलर विपक्षी के हिसाब से अपना खेल तय करते हैं। जब विपक्षी से मुकाबला है तब तो विपक्षी के हिसाब से कुछ चीजें तय करनी ही होंगी लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि आपके पास कोई लय, कोई तालमेल, कोई रणनीति ही न रहे। भई विपक्षी को आपके हिसाब से रणनीति तय करने दें.सप्रे स्कूल मैदान पर बालिकाओं को मैंने खेलते देखा। वे दूर से किक मार रही थीं और उनकी किक में कोई दम नहीं था। मैं होता तो सिखाता कि पहले अपनी क्षमता के हिसाब से, कम दूरी से किक मारो और लक्ष्य पर मारने की कोशिश करो। इसका अभ्यास करते करते ताकत भी आती जाएगी और निशाना भी सही बनेगा। दूर से किक मार रही लड़कियों का जी उचट रहा था, गेंद इधर उधर जा रही थी, उसे लाने में ही लड़कियों की बहुत सी ताकत खत्म हुई जा रही थी। मुझे नहीं लग रहा था कि इन लड़कियों को किसी ने स्टेमिना, डाइट जैसी चीजों के बारे में बताया है। ये चीजें कोई भी सीनियर खिलाड़ी बता सकता है जो खेल के प्रति गंभीर हो और जिसने ये सब चीजें सीखी हों। मुझे पता नहीं शहर के कितने खिलाड़ी अपने से ज्यादा जानने वालों से जाकर मार्गदर्शन लेते हैं और कितने सिर्फ टूर्नामेंंट में खेलते हैं। पता नहीं कितने खिलाड़ी और कोच, मैदान को साफ सुथरा रखने के बारे में भी सोचते होंगे। मैदान से गिट्टी, पत्थर हटाना, कांच के टुकड़े बीनकर फेंकना, झाडिय़ां साफ करना, पानी छिड़कना-ऐसे बहुत से काम हैं जो खिलाडिय़ों और प्रशिक्षकों को करना चाहिए। अगर खिलाडिय़ों से उम्मीद नहीं की जाएगी कि वे मैदान से प्यार करें, तो फिर किससे उम्मीद की जाएगी?
राज्योत्सव की यादें
एक और राज्योत्सव बीत गया। और अपने पीछे बहुत सी यादें, बहुत से सवाल छोड़ गया। यादें तो होंगी ही। इतने दिनों तक, इतने लोग कहां बार बार जुटते हैं? इतने सारे स्टाल कहां लगते हैं? पूरी सरकार सामने रहती है। पूरा बाजार सामने रहता है। चना जोर गरम से लेकर भिलाई इस्पात संयंत्र, टाटा, जिंदल सब वहां होते हैं। लेकिन इतना सब कुछ होने पर भी यह मेला बहुत से मामलों में खटकता रहा। अगर इन पर ध्यान दिया जाएगा तो आगे इसका भविष्य अच्छा होगा। वरना इतना सारा इंतजाम हो तो भीड़ तो कहीं भी जुट जाती है। राज्योत्सव के सरकारी आयोजनों को सरकारी आयोजन के घिसे पिटे अर्थ से बाहर आना चाहिए। सरकारी आयोजन का मतलब होता है चूंकि ऊपर से आदेश आया है इसलिए कुछ झांकी बनाकर पेश करनी है। राज्योत्सव के इतने बरस में देखा जा चुका है कि बहुत से वही वही चेहरे नजर आते हैं। और कुछ व्यक्तियों को आयोजन से बड़ा महत्व मिला होता है। सरकारी लोग आम लोगों से दूरी बनाकर रखते हैं। वे अलग दरवाजों से अंदर जाते हैं, अलग जगह गाड़ी खड़ी करते हैं, स्टाल पर सोफे लगाकर बैठते हैं। थके हारे बच्चे बूढ़े भले दो मिनट सुस्ताने के लिए जगह ढूंढते रहें। सोफे पर बैठ गए तो सवाल खड़ा हो जाता है- आप कौन हैं, क्या काम है आपको? ेमेले में खर्च अधिक होता है, उपयोगिता कम होती है। मेले में ज्यादातर स्टाल विभाग के कामकाज के बारे में अच्छी तरह जानकारी नहीं दे सके। कुछ में मुर्दा और बेहूदा किस्म के पुतले बनाकर रखे गए थे और लोग उन्हें देखकर हंस रहे थे। टीका टिप्पणियां कर रहे थे। सरकारी विभाग के लोग बेपरवाही में, मजबूरी में स्टाल पर या आसपास खड़े नजर आए। कहीं कहीं तो कोई कुछ बताने वाला नहीं था। बहुत से स्टालों में बहुत से उत्साही लोग थे जो कुछ बताने को उत्सुक थे, निजी क्षेत्र के स्टालों में भी ऐसे लोग थे और सरकारी क्षेत्रों में भी, लेकिन सारे लोग ऐसे नहीं थे। स्टालों पर जितना खर्च दिख रहा था, उनकी उपयोगिता उतनी ही कम थी। इतनी भीड़ थी कि कहीं खड़े रहकर कुछ पूछना मुश्किल हो रहा था। बहुत से स्टालों में नेताओं के फोटो लगे थे मानो उनका मंदिर बना दिया गया हो। और वही घिसा पिटा, कठिन हिंदी में सरकारी प्रचार। प्रदेश की संभावनाओं, उन संभावनाओं को सच करने की दिशा में हो रहे प्रयासों, चुनौतियों और कमियों का मौलिक सोच के साथ, संपूर्णता में प्रदर्शन बहुत कम दिखा। उत्सव के दौरान कुछ राजेनेता और उनके करीबी लोग बार बार मंच पर आते रहे। मंच पर आने के बहाने खोजते रहे। कभी कभी तो लगा कि इनके लिए उत्सव हो रहा है। यह सस्तापन खत्म होना चाहिए। मंच पर जिसका काम हो उसे ही रहना चाहिए। और कलाकारों से लेकर उद्घोषक तक, नए ढंूढने चाहिए। हर बार नए नए लोगों को मौका मिलना चाहिए। प्रदेश में प्रतिभावान, सक्षम लोगों की कमी नहीं है। मगर खुद को और अपने दरबारियों को खुश करने वाले लोगों को इससे क्या मतलब। प्रदेश के संस्कृति कर्मियों को मिलकर इस विषय पर गंभीर सोच विचार करना चाहिए कि राज्योत्सव के मंच पर किन लोगों को स्थान दिया जाना चाहिए, उनका स्तर क्या है, उन्हें पहले कितने अवसर मिल चुके हैं, क्या लोकतंत्र नाम की कोई चीज है कि नहीं या वह कुछ पैसे वालों की जेब में डाल दिया गया है? हालांकि जो लोग सत्ता की मलाई खाने के लिए खुद लाइन में लगे हुए हैं, ऐसे लोगों को हटा दिया जाए तो विचार करने के लिए बहुत कम लोग बचेंगे। राज्याश्रय का मोहताज मीडिया भी इस तरह के मुद्दों को छूता नहीं। वैसे अच्छा ही है। मीडिया पर हावी कुछ पैसे वाले बददिमाग लोग फिर जज बनकर संस्कृति के बारे में फैसले देने लगेंगे। राज्योत्सव में गंदगी देखकर मन खराब होता है। इतने कागज पड़े होते हैं, इतनी जूठन पड़ी होती है, कोई रोकने-टोकने वाला नहीं, कोई उठाकर साफ कर देने वाला नहीं। सब अपने अपने कपड़ों की फिक्र कर रहे हैं। मंत्रियों को तो खैर स्पेशल रास्ते से आना है, कार से उतरना है और मंच पर बैठ जाना है। उन्हें गंदगी से क्या लेना देना। मरे जनता गंदगी में। खाने पीने के स्टाल के बारे में कहना होगा कि छत्तीसगढ़ का राज्योत्सव है तो छत्तीसगढ़ को प्रमोट करने का एक अच्छा मौका है। एक स्टाल छत्तीसगढ़ी व्यंजन का लगाकर यह काम पूरा नहीं होता। चाट पकौड़ी और आइसक्रीम के स्टालों की भरमार के बीच कहीं तो लगना चाहिए कि छत्तीसगढ़ का उत्सव है। छत्तीसगढ़ में हजारों किस्म का धान होता है। यहां के कुछ इलाकों का दुबराज मशहूर रहा है। क्यों नहीं छत्तीसगढ़ की इस समृद्धि को इतनी ही जगह दी जाती जितनी फूहड़ और बेजान सरकारी विभागों को दी गई? जिनमें बिकने वाला सामान इतने घटिया ढंग से पेश किया गया मानो यह छत्तीसगढ़ की मूर्खता को प्रदर्शित करने की नीयत से किया जा रहा हो। बाजार में बिकने वाले चिप्स की पैकिंग की तुलना में घरेलू उद्योगों के प्रोडक्ट को देखकर रोना आ रहा था। ऐसा नहीं कि छत्तीसगढ़ ऐसा है। दरअसल सरकारी तंत्र ऐसा है।
Wednesday, December 16, 2009
दशहरे की एक याद
आज दशहरा है। अक्सर दशहरे पर कुछ लिखने का संयोग बन जाता है। पिछले कई दशहरों पर मैंने महसूस किया कि ठंड इसी दिन से शुरू होती है। लेकिन इस बार पिछले कई दिनों से ठंड महसूस हो रही है। दिन में तो इसका पता नहीं चलता लेकिन देर रात और सुबह सुबह अच्छी ठंडकर रहती है। कल मैंने पांच छह जगह भंडारों का आनंद लिया। मेरे लिए यह एक आनंद है। मैं इसे एक लोकतांत्रिक आयोजन पाता हूं। हालांकि यह आयोजकों पर निर्भर करता है कि वे कितने लोकतांत्रिक हैं। वे भक्तों के लिए भोजन का प्रबंध करने वाले सेवक हैं कि गरीबों को खैरात बांटने वाले सामंत। अलग अलग जगहों पर मैंने अलग अलग तेवर वाले आयोजक देखे। सबसे विनम्र नए बस स्टैंड के भंडारे वाले थे। वे सब गरीब थे और लोगों को बुला बुलाकर माता का प्रसाद बांट रहे थे। यह आलू और गोभी वाला पुलाव था और बहुत स्वादिष्टï था। मैंने पिछले आठ नौ दिनों तक भूख से निबटने के पूरे इंतजाम के साथ उपवास किया था। ऐसे उपवास में बड़ा मजा आता है। जरा भी चर्बी कम नहीं होती। जरा भी कष्टï नहीं होता। भूख का तो मानो अहसास तक नहीं होता। जब भी भूख लगे, आपके पास साबूदाने की खिचड़ी, आलू की टिकिया, केले, सेब, अंगूर, दूध सब हाजिर हैं। बाजार में हल्दीराम का फलाहारी चिवड़ा मिलता है और बनाना चिप्स भी। पाक कला में निपुण, खाने पीने की शौकीन, संपन्न भक्तन महिलाओं के साथ अगर आप उपवास करेंगे तो फायदे में रहेंगे। बहरहाल, इस उपवास में सिर्फ इतना कष्टï था कि अनाज एक टाइम खाना है और लहसुन प्याज नहीं खाना है। मैं सच्चा उपवास करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। मगर एक टाइम खाने का नियम रखकर भी महसूस किया कि उपवास एक अनुशासन सिखाता है, संयम सिखाता है। दुनिया में खाने पीने की ढेर सारी चीजें हैं। लेकिन कब कितना खाना है, यह इंसान को अपने नियंत्रण में रखना चाहिए। चीजें तो इतनी हैं कि वह खाता रहे। लेकिन नुकसान उसे ही उठाना है। यह सिर्फ खाने के मामले में नहीं, हर मामले में होता है।मैंने भंडारों में घूम घूम कर तय किया है कि कभी अनुकूल वातावरण रहा तो अपने मित्रों के साथ मिलकर इसका आयोजन करूंगा। बचपन में हम सब घरों से अनाज और दूसरी चीजें इक_ïा करके पिकनिक करते थे। यह भी इसी तरह की चीज है। मिलबांट कर खाने का सुख इन भंडारों से मिलता है। भंडारे हमें याचक भाव सिखाते हैं। याचक भाव का यह मतलब नहीं कि हम पूरी जिंदगी मांगकर बैठे बैठे खाएं। याचक भाव का मतलब है कि हममें हेकड़ी न रहे। यह हेकड़ी कभी कभी इंसान को सूखी लकड़ी की तरह तोड़ देती है।
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