Tuesday, April 20, 2010

गाँधी का सपना था सुराज...

रायपुर. देश को स्वराज तो मिल गया, अब सुराज आना चाहिए. यह गाँधी जी का सपना था. डॉ. रमन सिंह की सरकार इसे साकार कर रही है. यह बात लोक निर्माण, स्कूल शिक्षा, पर्यटन और संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने आरंग ब्लोक के ग्राम बना में ग्राम सुराज अभियान के दौरान कही. उन्होंने यहाँ ७५ लाख रूपये के काम स्वीकृत किये और कहा- यही सुराज है. उन्होंने कहा कि मुख्यानंत्री के निर्देश पर सरकार खुद चलकर गाँव गाँव में जा रही है. जनता के सामने उसके काम की समीक्षा हो रही है. ग्रामीणों की ज़रूरतों के बारे में जानकारी ली जा रही है. आगे की योजनायें इसी के आधार पर बनेंगी.
१२ पंचायतों का पटवारीबाना में ग्रामीणों ने शिकायत की कि पटवारी गाँव में नहीं आता. पता चला कि उसके जिम्मे १२ पंचायतों का काम है. नाराज ग्रामीणों ने पटवारी को हटाने की मांग की. श्री अग्रवाल ने कहा कि जितना काम हो रहा है, पटवारी को हटाने पर उतना भी नहीं होगा. उन्होंने तहसीलदार से कहा कि इस विसंगति को शीघ्र दूर किया जाये. सरकार दो पंचायतो के पीछे एक पटवारी रखना चाहती है. अधिक से अधिक चार पंचायते हो सकती है. लेकिन एक के जिम्मे १२ पंचायतें देना गलत है.
स्वास्थ्य कार्यकर्ता रोज आयें. स्वास्थ्य कार्यकर्ता ने बताया कि उसके जिम्मे बाना, बनरसी और गुमा का काम है. वह ८-१० दिन में यहाँ आता है. श्री अग्रवाल ने उसे रोज आने कहा.
सम्बन्ध ठीक होना चाहिए. आँगनबाड़ी कार्यकर्ता के खिलाफ भी ग्रामीणों की नाराजगी सामने आई. बताया गया कि आँगनबाड़ी से गरम खाना नहीं मिलता. श्री अग्रवाल ने कार्यकर्ता से कहा कि काम अगर हो रहा है तो वह दिखना भी चाहिए. आप गाँव के कुछ प्रमुख लोगों को बीच बीच me आँगनबाड़ी में बुलाइए. उन्हें खाना भी खिला दीजिये. इससे उनकी गलतफहमियां दूर हो जाएँगी.
इसी साल बनी टंकी लीकग्रामीणों ने बताया कि बनरसी में इसी साल बनी टंकी लीक हो रही है. श्री अग्रवाल ने इसे ठीक करने के निर्देश दिए. उन्हें बताया गया कि गलत काम करने वाले ठेकेदार को नोटिस दी गयी है.
७५ लाख की सौगातें. श्री अग्रवाल ने ग्रामीणों की मांग पर बनरसी में स्कूल आहाते के लिए २ लाख, गुमा प्राथमिक शाला में दो कमरों के लिए ६ लाख, बाना में आँगनबाड़ी भवन के लिए 3 लाख, बनरसी में राशन और पंचायत भवन के लिए ५ लाख, बाना में सड़क मुरमीकरण के लिए २ लाख, पचरी तालाब गहरीकरण के लिए ६ लाख, सोनाही डबरी तालाब गहरीकरण के लिए ५ लाख, सड़कों के लिए करीब १७ लाख, इस तरह कुल करीब ७५ लाख के कामो की घोषणा की.

Friday, April 16, 2010

हम अपने शहर में होते तो घर चले जाते

जशपुर के सर्किट हाउस से
सुराज का काफिला जशपुर में दो अलग-अलग जगहों पर ठहरा है । कल सारा दिन तेज धूप में हुई सभाओं के बाद देर रात फुरसत मिली । सुबह देर तक सोने के बाद भी थकान उतर नहीं पाई है । आज यहां से सभाएं लेते हुए मंत्री जी का कारवां अम्बिकापुर तक जायेगा ।
मंत्रियों और उनके साथ चलने वालों के बारे में लोगो की आम धारणा है कि ये लोग भारी ऐशो-आराम के साथ चलते हैं, अच्छा खाते पीते हैं और आराम से सोते हैं । लेकिन बृजमोहन अग्रवाल के साथ चलने का अनुभव इससे एकदम अलग है ।
वे एक प्रभावशाली मंत्री हैं। यह प्रभाव उनके ज्ञान और अनुभव से उपजता है, इसके आगे काम न करने वाले अफसर परास्त हो जाते हैं । उनके साथ पैदल चलना भी कठिन है और उनके सवालों से बच पाना आसान नहीं । वे लगातार सवाल दागते हैं और आपका पूरा रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने आ जाता है । हर सभा में वे लगातार आधे-एक घंटे तक बुलंद आवाज में बोलते हैं । लोगों की फरियादें सुनते हैं । अफसरों से पूछकर उनका तत्काल समाधान करते हैं फिर धान का बोनस, खेती के औजार, नाव-जाल जैसी चीजें  बांटने का लम्बा सिलसिला चलता है । और यह सब 40 के ऊपर  के तापमान पर चलता रहता है । आखिरी सभा कभी रात 12 बजे होती है तो कभी रात दो बजे ।
अगर आप रिपोर्टिंग के लिए साथ चल रहें हैं तो एक दो सभाओं के बाद आपको ऊब होने लगती है और आप  बुरी तरह थक जाते हैं. लेकिन जिसके नेतृत्व में आप चल रहें हैं, वह थकने के लिए तैयार नहीं है । और हाँ , यह कोई बारात नहीं है । इसमें आपका स्वागत नहीं होता। बैठने के लिए कुर्सियां नहीं मिलतीं  और किसी ने पानी के लिए पूछ लिया तो आप इसे सौभाग्य मानियें । खाने की व्यवस्था जरूर होती है लेकिन खाने तक आप कब पहुंचेगें यह तय नहीं होता । इस यात्रा में शामिल लोगों के लिए यह कोई मनोरंजक सफर नहीं है । आपको टोलियां बनाकर हंसी ठ्टठा करने वाले नहीं मिलते । हर कोई बेहद चौकन्ना है कि साहब कब क्या पूछ लेंगे । चार दिनों की यात्रा का अनुभव कहता है कि दूर बैठकर सरकार की कमियां निकालना आसान है, सरकार चलाना आसान नहीं है ।

साहब डांटते हैं, सस्पेण्ड नहीं करते -
मंत्री जी के साथ ऐसी कई यात्राओं में रह चुके लोग अपने अनुभव बांट रहें हैं । इससे उनकी अलग-अलग खूबियों का पता चल रहा है । लोग बताते हैं कि किसी से एक बार मिलने के बाद अगली मुलाकात दो साल बाद भी हो तो इस बात की संभावना रहती है कि वह उसे नाम लेकर बुलाएं । उनकी याददाश्त बहुत तेज है । यह बात तो उन्हें मंच से सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं के बारे में बताते हुए देखकर भी पता चलती है । उन्हें लगभग सभी योजनाओं के नाम याद हैं और उनके   प्रावधान भी । उनकी  एक और खूबी का पता चल रहा है कि उनकी  बेहद सख्त मिजाज छवि के भीतर एक धड़कता हुआ दिल भी है और एक दूर तक देखने वाला राजनेता है  जो विनाश में नहीं निर्माण में विश्वास रखता है । लोग बताते है कि काम में कोताही पर वे नाराज होते हैं, जान बूझकर की गयी गलतियों पर डांटते हैं, जो अपनी गलती मानता है उसे सुधरने का मौका देते हैं, सुधरने के रास्ते बताते हैं और अक्सर सस्पेंड  करने की धमकी तो देते हैं, पर सस्पेण्ड नहीं करते । सख्ती वे उन लोगों पर करते हैं जो गलती करके भी अपने को चालाक समझते हैं ।

छत्तीसगढ़ की खूबसूरती का जवाब नहीं -
इस लम्बी यात्रा के दौरान छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता और नैसर्गिक सुंदरता के दर्शन हो रहें हैं । कल रायगढ़ से निकलने के बाद काफिला बेहत खूबसूरत जंगल से होकर गुजरा । पतझड़ से सूने हो चुके पेड़ों में लाल हरी कोपले आ रहीं हैं । नीचे गिरे सूखे पत्तों को जलाया गया है और जंगल की धरती काली हो चुकी है । इस काली पृष्ठभूमि में पत्तियों और फूलों के रंग बहुत आकर्षक लगते हैं । तरह-तरह के पक्षी भी देखने में आ रहे हैं ।
मन कर रहा है खूब सारा समय लेकर यहां लौटूं  । जी भर कर तसवीरें उतारूं । लोगो से मिलूं-जुलूं । उनके बारे  में जानूं । फिर अज्ञेय की कविता भी याद आ रही है - अरे यायावर, रहेगा याद ?

Tuesday, April 13, 2010

ग्राम सुराज अभियान से लौटकर

रायपुर। ग्राम सुराज अभियान गांवों में हलचल मचा रहा है। काम नहीं करने वाले अफसर-कर्मचारी जनता के सामने खड़े किए जा रहे हैं। उन्हें डांटा जा रहा है। जरूरत पडऩे पर हटाया भी जा रहा है। छोटी बड़ी समस्याओं से परेशान लोग खुलकर अपनी बात कह रहे हैं। बालिकाएं और महिलाएं भी पीछे नहीं हैं।

रायपुर जिले में प्रभारी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के नेतृत्व में अभियान चल रहा है। सोमवार को रायपुर से गरियाबंद के बीच उन्होंने निमोरा, पिपरौद, किरवई, तर्रा, रजकट्टा और बारुका में सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं के अमल की पड़ताल की। ग्रामीणों से उनकी फरियादें सुनीं। मौके पर उनके समाधान की कोशिशें कीं और ग्राम विकास की बहुत सी मांगों के लिए तत्काल पैसा स्वीकृत किया। एक एक गांव को 25-50 लाख की मंजूरी मिल गई।

छत्तीसगढ़ी में सवाल, अंग्रेजी में जवाब
श्री अग्रवाल की क्लास छत्तीसगढ़ी में चल रही है। स्कूली बच्चों से वे ढेर सारे सवाल करते हैं। निमोरा में एक बच्चे से उन्होंने पूछा- स्कूल में खाना मिलथे? बच्चे ने कहा-यस। सारी सभा ठहाकों से गूंज उठी। श्री अग्रवाल ने बच्चे की तारीफ की।

बच्ची ने की बहस
कुछ बड़ी उम्र की एक बालिका ने बताया कि उसका जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पा रहा है। इसके लिए पिछले पचास साल का रिकार्ड मांगा जा रहा है। श्री अग्रवाल ने उसे समझाया कि यह सुप्रीम कोर्ट का आदेश है। इसके आगे हम कुछ नहीं कर सकते। नाराज बालिका बहस पर उतारू हो गई। उसने कहा- इसका मतलब हम तो आगे पढ़ ही नहीं पाएंगे। श्री अग्रवाल ने यह कह कर उसे शांत किया कि वे उसके लिए कोई रास्ता निकालेंगे।

मंत्री या हेडमास्टर
सरकार खुद चल के तुंहर गांव मं आए है। तुमन ल एती ओती जाए के जरूरत नइं हे। इन शब्दों के साथ वे अपनी बात शुरू करते हैं। फिर स्कूली बच्चों को स्टेज पर बुलवाते हैं। उनसे ढेर सारे सवाल पूछते हैं। बच्चे जवाब देते हैं। यह सिलसिला कुछ इस तरह चलता है-

- स्कूल में खाना मिलथे कि नहीं
0 मिलथे।
- का का मिलथे
0 रोटी....दार...
- अउ भात नइं मिले?
0 मिलथे...
- अउ का का मिलथे?
0 साग..
- अचार पापड़ नइं मिले?
0 नइं
- कुछु मीठा मिलथे कि नहीं?
0 मिलथे
- का मिलथे?
0 खीर
- कौन दिन मिलथे खीर?
0 शनिवार के।
- कोन बनाथे खाना?
0 राधाबाई
- खाना पेट भर मिलथे कि नहीं?
0 मिलथे।
- फिर तैं अतेक दुबली पतली काबर हस?

इसके बाद सभा ठहाकों में डूब जाती है।

फिर स्कूली किताबों के बारे में पड़ताल शुरू होती है।

- तुमन ला पु्स्तक मिलथे कि नहीं?
0 मिलथे।
- फोकट में मिलथे कि पइसा में?
0 फोकट में
- गुरुजी मन पइसा तो नइं मांगें?
0 नइ।
- एखर दाई- ददा मन बताओ भइ पइसा तो नइं देना पडि़स..
सभा में एक और ठहाका लगता है।

मैं नहीं कहों, लइका मन कहत हें
फिर बृजमोहन अग्रवाल का राजनीतिक कौशल दिखने लगता है। वे कहते हैं- देख लो भई। मैं नइं कहत हों, लइका मन कहत हैं कि ओ मन ला पेट भर खाना अउ फोकट में पुस्तक मिलत हे। कमल के सरकार पहिली अइसे सरकार है जे लइका मन ला फोकट में खाना अऊ किताब देवत है। गांव वाला मन संकल्प करो कि एक भी लइका बिना पढ़े लिखे नहीं रहना चाहिए।

थाली धोना अच्छी बात
ग्राम सुराज अभियान के दौरान निमोरा के एक ग्रामीण को एक अच्छी शिक्षा मिली कि खाना खाने के बाद खुद अपनी थाली धोना अच्छी बात है। जिले के प्रभारी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल अभियान के पहले दिन यहां पहुंचे थे। वे बच्चों से मध्यान्ह भोजन की जानकारी ले रहे थे। बच्चों ने उन्हें बताया कि उन्हें पेट भर भोजन मिल रहा है। श्री अग्रवाल ने गांव वालों से पूछा कि उन्हें इस संबंध में कोई शिकायत तो नहीं। एक ग्रामीण ने कहा कि बच्चों को खाना खाने के बाद थाली खुद धोनी पड़ती है। श्री अग्रवाल ने कहा- यह तो अच्छी बात है। यह हमारी संस्कृति है। मैं खुद भी खाना खाने के बाद अपनी प्लेट खुद उठाता हूं। यह संस्कार मुझे अपने बुजुर्गों से मिला है। ग्रामीणों ने इस पर जमकर तालियां बजाईं।

चेतावनी भी, तालियां भी
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और मितानिनें श्री अग्रवाल की क्लास में बुलाई जाती हैं। उनके लिए भी ढेर सारे सवाल हैं। कितने गांव देखती हो, कितनी गर्भवती माताओं को अस्पताल भेजा, उन्हें इसके लिए कितने पैसे मिलते हैं। गर्भवती माताओं को खाने में क्या दिया जाता है, बच्चों को क्या देते हैं। डिपो में दवाएं हैं कि नहीं। गांव में किसी को लू लगी क्या? गरमी में देने के लिए आपके पास ओआरएस है कि नहीं। यह देखना सुखद है कि मंत्री को हर सवाल का तुरंत और सकारात्मक जवाब मिलता है। आमतौर पर आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के खिलाफ शिकायतें नहीं मिलतीं। उनके लिए तालियां बजवाई जाती हैं।

Friday, April 9, 2010

कुछ और मौतें, कुछ और मोमबत्तियां

गृहमंत्री पी। चिदंबरम ने काम संभालने के बाद नक्सल मामले में कहा था कि हम इसकी गंभीरता का सही अनुमान नहीं लगा पाए। तब मेरे एक लेखक मित्र ने कहा था कि यह बहुत अच्छा बयान है। आगे उनसे समाधान की कुछ उम्मीद की जा सकती है। अब दंतेवाड़ा घटना के बाद उन्होंने कहा कि चिदंबरम की गंभीरता दिख नहीं रही। राजा का अच्छा होना काफी नहीं। उसे अच्छा दिखना भी चाहिए। चिदंबरम हम छत्तीसगढ़ में बैठे लोगों से बहुत दूर हैं। हम यहां बैठकर यह अनुमान नहीं लगा सकते कि वे कितने संवेदनशील, कितने जानकार और कितने गंभीर हैं। लेकिन मेरे खयाल से छत्तीसगढ़ में बैठे हम लोगों को सोचना चाहिए कि हम खुद कितने गंभीर हैं। सच तो यह है कि हमें किसी की मौत पर ओह कहने का अभ्यास हो गया है। और खाली समय में हम बहस कर लेते हैं। वरना बस्तर से ढाई तीन सौ किलोमीटर दूर रायपुर में ज्यादातर लोगों को दंतेवाड़ा की घटना से कोई फर्क नहीं पड़ा है। रायपुर बंद और मोमबत्ती जलाने जैसे प्रतीकात्मक काम जरूर किए जा रहे हैं लेकिन वे सिर्फ प्रतीकात्मक हैं। मेरा यह नितांत निजी आब्जरवेशन है कि किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा है। जिस रोज घटना हुई वह सत्तारूढ़ भाजपा का स्थापना दिवस था। पार्टी के प्रदेश कार्यालय में एक कार्यक्रम का आयोजन था। नक्सली वारदात में बड़ी संख्या में जवानों के मारे जाने की खबर आने के बाद पता नहीं किस समझदार नेता के कहने पर इसे श्रद्धांजलि सभा में बदल दिया गया। इसमें मैंने पार्टी के एक जिम्मेदार पदाधिकारी का भाषण खुद सुना और एक मंत्री का भाषण अखबार में पढ़ा। पदाधिकारी ने शुरूआत की दो चार लाइनें नक्सली घटना के बारे में कहीं फिर अपनी लाइन पर आ गए। उन्होंने बताया कि भाजपा ने कहां से शुरुआत करके यहां तक का सफर तय किया है। कार्यकर्ताओं ने तालियां बजाईं। 83 लोगों की मौत भी उन्हें भाजपा की कामयाबी पर ताली बजाने से रोक नहीं सकी। किसी को यह नहीं सूझा कि यह समय तालियां बजाने का नहीं है। पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारी पूरे जोश से भाषण दे रहे थे। नक्सल मामलों पर पार्टी की गंभीरता दिख रही थी। दंतेवाड़ा की घटना के बाद लगातार प्रतिक्रियाएं देखने सुनने में आ रही हैं। यह बहुत दुखद है कि बहुत से जिम्मेदार लोग घिसी पिटी बातें कहकर अपने संवेदनहीन होने का सबूत दे रहे हैं। नक्सली कायर हैं, हम उन्हें कामयाब नहीं होने देंगे, ऐसे बयान बार बार इस्तेमाल होकर अपना प्रभाव खो चुके हैं । इनसे अब बयान देने वालों की जड़ता प्रकट होती है। सुनने वालों को इससे चिढ़ हो चली है। अगर नक्सली कायर हैं तो यह बात कहने का यह उचित समय नहीं है। यह तो नक्सलियों का दुस्साहस है कि उन्होंने इतनी सक्षम फोर्स पर हमला कर दिया और इतना नुकसान पहुंचा दिया। यह तो दुश्मन का रणनीतिक कौशल है कि उसने जो चाहा कर डाला। नक्सली कायर हैं या नक्सली क्रूर हैं- इन बयानों का मतलब मुझे समझ में नहीं आया। आप उन लोगों के बारे में सोचिए जो नक्सली प्रभाव वाले इलाकों में रहते हैं। जिन्हें दोनों तरफ की बंदूकों के साए में जीना पड़ रहा है। क्या आप यह कहकर उनको राहत दे सकते हैं कि नक्सली कायर या क्रूर हैं? या शहीद जवानों के परिवारों को इससे सांत्वना मिल सकती है? नक्सली तो जो हैं सो हैं, आप बताओ कि आप क्या हो? पिछले दो दिनों में नक्सलियों को खत्म करने के बारे में कई अनौपचारिक बहसों में मैं शामिल हो चुका हूं। भाजपा से जुड़े एक व्यक्ति से मेरी मुलाकात हुई जिसने घटना स्थल के पास कभी शिक्षक के रूप में काम किया था। उसने मेरे एक सवाल के जवाब में बताया कि नक्सलियों का सूचना तंत्र बहुत मजबूत है। गांव वाले उनसे जुड़े हुए हैं। और यह सिर्फ डर की वजह से नहीं है। नक्सली उनको अपने विचारों से प्रभावित करते हैं और उनको प्रशिक्षित करते हैं। गांव वालों से अच्छे संबंध बनाने का काम तो फोर्स का भी है। और मोटे तौर पर पूरे सरकारी तंत्र का है। इस बारे में आम जनता की राय बहुत अच्छी नहीं है। आप किसी भी पार्टी के आदमी से अनौपचारिक चर्चा में पूछ लीजिए। कोई आदमी यह नहीं कहेगा कि सरकारी तंत्र के कामकाज से जनता खुश है। आखिर सरकारी भ्रष्टाचार की खबरों को जनता नक्सली घटनाओं से अलग करके कैसे देख सकती है? उसकी यह राय बनती है कि सरकारी तंत्र घोटाले करने में व्यस्त है, उसका नक्सलवाद से लडऩे में ध्यान नहीं है। जनता अफसरों नेताओं का विलासितापूर्ण जीवन भी देख रही है। अपनी रोजी रोटी के संघर्ष में जुटे लोगों को आप सरकारी विज्ञापनों से कितना भरमा सकते हैं? आम आदमी ऊबड़ खाबड़ सड़कों पर चलता है, अपमानजनक परिस्थितियों में नौकरी करता है, रिश्वत के बगैर उसका काम नहीं होता। शहर में रहने वाला पढ़ा लिखा आदमी इस अराजकता से परेशान और नाराज रहता है। फिर जंगल में रहने वाले अनपढ़ लोग कितने परेशान और नाराज होते होंगे इसकी कल्पना की जा सकती है।आप मेधा पाटकर की बात मत मानिए। लेकिन जो मुद्दे वे लोग उठा रहे हैं उनको नजर अंदाज मत करिए। यह आपके और मेधा पाटकर के बीच की लड़ाई नहीं है। मेधा पाटकर को यहां रहना भी नहीं है। जिन्हें रहना है उनके बारे में सोचिए।नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई के एक तो सिद्धांत बदलते रहते हैं। फिर खबरें बताती हैं कि अलग अलग सुरक्षा बलों के बीच समन्वय नहीं है। खबरें यह भी बताती हैं कि नक्सली इलाकों में पोस्टिंग रुकवाने के लिए अफसर लाखों खर्च करने के लिए तैयार हैं। इन विसंगतियों को क्या नक्सली आकर ठीक करेंगे? पिछले दो दिनों में कई लोगों ने कहा कि पुलिस को जगदलपुर या दंतेवाड़ा में मुख्यालय बना लेना चाहिए। बारीकी से मॉनिटरिंग होनी चाहिए। सरकार के पास काम करने की बहुत ताकत होती है। ईमानदारी से काम होगा तो जनता को कोई बात समझ में आएगी। लेकिन ज्यादातर लोगों की राय है कि यह भेडि़ए से यह कहने जैसा है कि वह घास खाकर गुजारा कर ले।

Tuesday, March 23, 2010

एक तितली, कई बातें


आज आंगन में कपड़े धोने के लिए पानी भरते समय यह तितली दिखी। वह धुले हुए फर्श पर बैठी थी। तितलियां अमूमन फूलों पर बैठती हैं। हमारी कंपाउंड वॉल से लगी झाडिय़ों में ढेर सारे फूल थे। शायद तितली को पता था कि मेरे पास कैमरा है। या फिर शायद यह वही तितली हो जिसकी तस्वीरें मैंने कुछ रोज कंपाउंड वॉल पर खींची थीं। यह तितली कंप्यूटर पर लोड हुई तो मैंने देखा कि इसके पंख बुरी तरह कटे फटे हैं। मेरा खयाल है ये पंख ऐसे तो नहीं होते होंगे? फिर भी तितली उड़ रही थी। मुझे लगा कि ये कोई फाइटर तितली है। खराब मौसम से, शिकारियों से लड़ रही है। मुझे लगा कि वह किसी परीलोक से मुझे अपनी तकलीफें बताने के लिए आई है। या फिर मुझे हौसला देने के लिए कि ऐसे टूटे फूटे पंखों से भी उड़ा जा सकता है। मुझे रंगीन पंखों वाली तितलियों से यह फाइटर तितली अधिक दिलचस्प लगी। मुझे लगा कि ये मेरी दोस्त बनने के लायक है।
इस तितली ने मेरी उत्सुकता बढ़ाई कि मैं तितलियों के बारे में कुछ जानूं। मैंने पाया कि तितलियों के बारे में मैं लगभग कुछ नहीं जानता, जैसा कि आसपास की ज्यादातर चीजों के बारे में मैं कुछ नहीं जानता। दुनिया में तितलियों की पंद्रह बीस लाख किस्में हैं। हजारों बरस से लोग इसकी खूबसूरती का इस्तेमाल कलाकृतियों में कर रहे हैं। इस पर दुनिया भर के वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं। इंटरनेट पर सर्च करते हुए तितलियों के बारे में कई दिलचस्प बातें पता चलीं। इनका जीवन एक हफ्ते से लेकर एक साल का होता है। अंडे से तितली बनने की चार अवस्थाएं होती हैं। इनके अंडे एक खास गोंद के जरिए पेड़ से चिपके रहते हैं। इनके लार्वा यानी इल्लियां अपना ज्यादातर समय पेट भरने में बिताती हैं। फिर प्यूपा अवस्था में यह जगह ढूंढती है और यह जगह अक्सर पत्तियों के नीचे होती है। यहां प्यूपा से तितली बनती है। कीट पतंगों में इस तरह के बदलाव को मेटामॉरफोसिस कहा जाता है। मेटामॉरफोसिस शब्द का इस्तेमाल मैंने पहली बार चट्टानों के सिलसिले में पढ़ा था। तितलियों की इल्लियां पत्तियां खाते वक्त शहद जैसा मीठी चीज बनाती हैं। इसे हनी ड्यू कहा जाता है। यह चींटियों के काम आता है। चींटियों की मौजूदगी इल्लियों को लेडी बीटल जैसे दुश्मनों से बचाती है। यह जानकारी बताती है कि कुदरत ने छोटी छोटी चीजों के कैसे इंतजाम कर रखे हैं। और हर चीज से कितना कुछ सीखा जा सकता है।
तितलियां पराग कणों को एक से दूसरे फूलों तक ले जाकर वनस्पति जगत का एक जरूरी काम करती हैं। हालांकि यह काम सिर्फ तितलियां नहीं करतीं। ज्यादातर तितलियां फूलों से अपना आहार लेती हैं। इसकी कुछ इल्लियां कुछ कीड़ों को भी खा लेती हैं। तितलियों की कुछ प्रजातियां सड़े हुए मांस, फल, गोबर या गीली रेत की नमी से भी पेट भर लेती हैं। यह अपने दो एंटीना की मदद से गंध पाती हैं और इन्हें फूलों का पता चल जाता है। तितलियों की कुछ प्रजातियां लंबी दूरी तय करने के लिए जानी जाती हैं। जैसे मोनार्क तितलियां मेक्सिको से उत्तरी अमरीका या दक्षिणी कनाडा तक 4000 से 4800 किलोमीटर की दूरी तय करती हैं।
कलाकारों को तितलियां बहुत आकर्षित करती हैं। कई कलाकार तितली को आत्मा के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। इसे फ्रेम करके, लेमिनेट करके, रेजिन से मढ़कर और कई दूसरे तरीकों से कलाकृतियां बनाई जाती हैं।
शायरों ने तितलियों को लेकर बहुत लिखा है। मुझे तीन शेर याद आ रहे हैं-


नसीबों में लिखी जिनके लिए तनहाइयां होंगीं.
गुलाबों के नगर में ऐसी भी कुछ तितलियां होंगीं।
-वाली आसी


गुल से लिपटी हुई तितली को गिराकर देखो
आंधियों तुमने दरख्तों को गिराया होगा
-कैफ भोपाली


जश्न था बहारों का और अहले गुलशन ने
गुलसितां सजाने को तितलियों के पर काटे
-मुकीम भारती

मुझे लगता है सुबह मेरे आंगन में बैठी तितली, ऐसे ही किसी जश्न से बचकर भागी हुई थी।


Monday, March 15, 2010

रमेश भाई ओझा की कथा


आप में से कई लोगों ने रमेश भाई ओझा का नाम सुना होगा। कई लोगों ने उनकी कथा भी सुनी होगी। मैं धार्मिक व्यक्ति नहीं हूं लेकिन टीवी पर जब कभी उनका प्रवचन चलता है, मैं कुछ देर रुक कर सुन लेता हूं।
उनका अध्ययन विशाल है। उनकी दृष्टि व्यापक। उनकी वाणी में तेज है। उनका सेंस ऑफ ह्यूमर बहुत अच्छा है। वे गाते भी बहुत अच्छा हैं। कथा कहने की उनकी शैली बांधने वाली है। गुजरात में उनकी बड़ी मान्यता है। वे देश-विदेश में प्रवचन करते रहते हैं।
कुछ बरस पहले वे हमारे शहर में आए थे। तब मैं एक बड़े अखबार में काम करता था। अखबारों का भी यह दिलचस्प वर्गीकरण है। अखबार अच्छा या बुरा नहीं होता। सही या गलत नहीं होता। वह छोटा या बड़ा होता है।
बहरहाल, मैं पत्नी के साथ उनका प्रवचन सुनने गया। साथ में भंडारा भी था। मुझे भंडारों में खाने का बहुत शौक है। मैं नहीं जानता कि मेरे जाने के पीछे भंडारे की कितनी भूमिका थी, पत्नी को खुश रखने की मंशा कितनी थी और रमेश भाई ओझा को सुनने की उत्सुकता कितनी थी।
मगर मैं अखबारनवीस दादा का पोता हूं और साहित्यकार पिता का पुत्र। सो मैंने बड़ी तन्मयता से रमेश भाई को सुना और समाचार बनाने के लिए जरूरी बातें नोट भी कीं। मेरी एक आदत है। कोई बात पसंद आ जाती है तो उसके बारे में दस लोगों को बता डालता हूं। सो मैंने खबर बनाने के साथ साथ प्रेस में कई लोगों को कथा के अंश सुना दिए। कई लोगों को रमेश भाई ओझा का परिचय दे डाला। कई लोगों को वहां जाने की प्रेरणा दे डाली।
मेरे कुछ परिचित वहां गए भी। और लौटकर मुझे धन्यवाद दिया कि मैंने उन्हें एक अच्छी अच्छी जगह जाने का अवसर दिया। ज्यादातर ने लौटकर बताया कि रमेश भाई बहुत विद्वान व्यक्ति हैं, उनकी भाषा बहुत सुगम और प्रभावशाली है। कुछ ने कथा के बारे में भी चर्चा की।
इन्हीं में एक सज्जन सबसे अलग थे। उनसे मेरी बनती नहीं थी। वे पैसे वाले थे और गरीबों के प्रति अपनी हिकारत को छिपाते नहीं थे। प्रेस के प्रभावशाली लोगों के पास जाकर वे उठते बैठते रहते थे। पता नहीं वे उन्हें क्या दे देते थे कि उनका देर से आना सब नजरअंदाज करते थे। वे नौकरी छोड़कर चले जाते थे और कुछ दिनों बाद फिर लौट आते थे। मैंने सुना था कि वे शिकायतें करने में माहिर हैं। इसलिए कई सीनियर भी उनसे डरते हैं।
जहां तक मेरा खयाल है, मैंने उन्हें कथा के बारे में नहीं बताया होगा। उन्होंने तब सुन लिया होगा जब मैं दूसरों को बता रहा होऊंगा। वैसे भी रमेश भाई ओझा का शहर में आना एक बड़ा समाचार था। जो भी हो, मतलब की बात यह है कि वे भी कथा सुनने गए।
लौटकर उन्होंने बताया- मैं भी गया था कथा सुनने। बहुत अच्छी व्यवस्था है। अरे भई, आयोजकों की इनर सर्किल के एक भाई मेरे परिचित निकल गए। फिर क्या था- उन्होंने बहुत आग्रह पूर्वक मुझे आगे ले जाकर बिठाया। वहां गद्दे लगे हुए थे। पंखे चल रहे थे। रमेश भाई को हम लोग बहुत पास से देख सकते थे। बाहर गर्मी बहुत थी लेकिन हम लोग आराम से बैठे। कथा के बाद मेरे परिचित ने मुझसे भंडारे में प्रसाद लेने का आग्रह किया। एक तो भीड़ बहुत थी। फिर हमें वापस भी आना था। सो हम हाथ जोड़कर लौट आए।
उन्होंने कई लोगों को यह कथा सुना डाली। अपने परिचित से अपने प्रगाढ़ रिश्तों को बार बार बता डाला। आयोजकों का महिमामंडन किया और आयोजन का अनुमानित खर्च भी बता दिया। उन्होंने यह भी बता दिया कि आयोजन स्थल का किराया कितना है और उसका एरिया कितना है।
जो लोग उन्हें जानते थे उन्होंने उनसे नहीं पूछा कि कथा में रमेश भाई ओझा ने क्या कहा।

( एक पुराना संस्मरण)

Saturday, March 13, 2010

यूं ही गर रोता रहा गालिब...



मैं महादेव घाट पर अकेला बैठा था। एक पुराने दोस्त का फोन आया। उसने कहा कि वह परेशानी में है। क्या मैं उसके पास पहुंच सकता हूं? वह रायपुर की एक सड़क किनारे ठेला लगाकर फल बेचता है। मैं थोड़ी देर बाद उसके पास पहुंचा। मुझे देखकर वह रोने लगा। बीस साल में पहली बार उसे रोते देखा। उसने बताया कि सुबह एक महिला उसकी दुकान से केले ले गई। थोड़ी देर बाद वह वापस आई। उसने दोस्त से कहा कि तुमने मुझे दस रुपए वापस नहीं किए। दोस्त का कहना था कि उसे अच्छी तरह याद है कि रुपए वापस किए हैं। वे अपने पर्स में देख सकती हैं। वह महिला किसी प्रभावशाली व्यक्ति की बहन थी। घर जाकर उसने अपने लोगों को बताया। थोड़ी देर बाद कुछ लोग वहां पहुंचे और दोस्त पर बदतमीजी का आरोप लगाकर उसे खूब मारा।
मेरा दोस्त मुझसे क्या चाहता था पता नहीं। शायद वह उन लोगों को सजा दिलवाना चाहता था। मैंने उसे सांत्वना दी। यह पूछा कि वे लोग दोबारा तो नहीं आएंगे। मैने उसे घटना को भूल जाने कहा। और कहा कि कुछ चीजें ऊपर वाले पर छोड़ देनी चाहिए। लडऩे का समय न मेरे पास है न तुम्हारे पास। न इतनी ताकत है।
मेरा यह दोस्त मेरे गृहनगर धमतरी के पास एक गांव का रहने वाला है। मैंने धमतरी में जिस प्रेस से काम की शुरुआत की थी, उसने भी वहीं काम किया था। बाद में मैं रायपुर आ गया। यहां भी वह मुझे साथ में काम करता हुआ मिला।
वह प्रेस में पेस्टिंग करता था। तब उसकी नई नई शादी हुई थी। उसकी जिम्मेदारियां बढ़ गई थीं। और परेशानियां भी। वह घर चलाने के लिए ओवरटाइम काम करता था। दिन में भी और रात में भी। कभी कभी वह खड़े खड़े झपकी ले लेता था। इसका हम सब मजाक बनाते थे। वह अक्सर मुझे अपने घर ले जाता था, खाना खिलाने। घर ले जाने का मतलब था रास्ते में जरूरत का सामान खरीदा जाए। पैसे मेरे पास होते थे। बीच बीच में वह सौ दो सौ रुपए उधार लेता रहता था। प्रेस में तनख्वाह बहुत कम और देर देर से मिलती थी। वे उसके लिए बहुत कठिन दिन थे जो धीरे से उसकी जिंदगी का हिस्सा बन गए।
वह किसान परिवार से था। उन्हें कृषि मजदूर कहना ज्यादा सही होगा क्योंकि एक दो एकड़ जमीन वाला किसान आधा मजदूर ही होता है। उसका जीवन सीधा सादा था। बीच में वह पीने वालों की संगत में पड़ गया। पर शायद जल्द ही संभल गया। उसने परिचितों से कर्ज लेकर एक मकान खरीद लिया। और कर्ज चुका भी दिया। बीच बीच में वह कहता- उस नौकरी से यह धंधा अच्छा है। कम से कम मालिक बनकर तो बैठे हैं। नौकरी में रहता तो क्या मकान खरीदने के बारे में सोच पाता? अब उसके बच्चे बड़े हो रहे थे। इन दिनों उसकी चिंता बच्चों को लेकर ही रहती थी।
वह पेट रोजी में लगा एक आम आदमी था। जिसकी पत्नी उससे बहुत खुश नहीं रहती थी। वह घर चलाने में पत्नी का सहयोग चाहता था। बीच में उन्होंने एक फैंसी स्टोर भी खोला था। वह नहीं चल पाया। वह इसे लेकर पत्नी से नाखुश था। स्टोर का अनबिका सामान घर में पड़ा था। वह बताता था कि जब भी नजर उधर जाती है, मन खराब हो जाता है। रोज कमाने, रोज खाने की स्थिति मे पैसों की यह बरबादी उसे कचोटती है।
उसे रोते देखना इसलिए अधिक खराब अनुभव था क्योंकि वह एक जिंदादिल आदमी था। बहुत शौकीन। पता नहीं किस तरह पैसे जोड़ जोड़ कर वह एक बार अपनी पत्नी के साथ हवाई जहाज से पुरी गया था। फ्लाइट शायद भुवनेश्वर तक जाती है। बहरहाल, यह एक दिलचस्प घटना थी और मोहल्ले वाले उसे विदा करने के लिए जमा हो गए थे। मैंने उसकी इस यात्रा पर छत्तीसगढ़ी में एक वृत्तांत भी लिखा था जो अखबार में छपा था। दोस्त ने उसे फ्रेम करवाकर घर की दीवार पर टांग रखा है।
ुउसके घर से मेरी कुछ मीठी यादें भी जुड़ी हैं। एक बार उसने किसी काम से मुझे अपने घर भेजा। घर पर भाभी थी। उसने कहा- खाना बन गया है। लेकिन उससे पहले नहा लो। अच्छा लगेगा। फिर उसने यह भी जोड़ दिया- नहाए बगैर खाना नहीं मिलेगा। मैंने नहाकर खाना खाया। भाभी के रिश्ते को मैंने वहां पहले पहल महसूस किया। वह मां बहन और दोस्त के बीच का कोई प्यारा सा रिश्ता था। आने वाले दिनों में कम ही ऐसे मौके रहे जब मैं उनके घर से खाए बगैर लौटा।
शादी के बाद मैं जिन लोगों का अपने घर आना जाना देखना चाहता था उनमें से एक इस दोस्त का परिवार भी था। लेकिन शादी के बाद मेरे घर की परिस्थितियां भी एकदम बदल गईं। उनमें एक गरीब आदमी के लिए सम्मान की जगह नहीं थी। यह अलग बात है कि मैं भी रोजी रोटी की चिंता से आगे कभी सोच नहीं पाया।
जिस कालोनी के पास यह दोस्त फल का ठेला लगाता है वह पुराने मालगुजारों की कालोनी है। गांवों में जिनकी बाप दादाओं की जमीनें हैं, रोजी रोटी की जिन्हें चिंता नहीं है, जिनकी अपेक्षा यह रहती है कि आस पास के लोग उन्हें पांव परत हौं महाराज कहकर अभिवादन करें। ये बाहरी लोग नहीं हैं। ये अपने ही लोग हैं।
छत्तीसगढ़ में अक्सर स्थानीय और बाहरी का मुद्दा उठता रहता है। मुझे लगता है कि बाहरी लोगों से खतरा उन लोगों को है जो पहले से यहां के लोगों का शोषण कर रहे थे। बाहरी लोगों के आने से उनका एकाधिकार चला जाएगा। छोटे लोगों का क्या है। वे तो पहले भी शोषित रहे हैं। बाहर से लोग आएंगे तो शायद उनकी संगत में आकर यहां के लोग भी सिर उठाना सीख जाएंगे, प्रतिकार करना सीख जाएंगे।
दोस्त का रोना देखकर मुझे गालिब का शेर याद आया- यूं ही गर रोता रहा गालिब तो ऐ अहले जहां, देखना इन बस्तियों को तुम कि वीरां हो गईं। पलायन के दिनों में यहां के गांव वीरान हो जाते हैं। नक्सलवाद या सलवाजुडूम के चलते बस्तर में कई गांव शायद हमेशा के लिए वीरान हो गए हैं।
मेरे कुछ जानकार दोस्त बताते हैं कि वहां आने वाले उद्योगों को यही तो चाहिए।